शूद्र और प्रतिक्रांति
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8.374. जो शूद्र उच्च वर्ण की किसी रक्षित ख्1, या अरक्षित नारी के साथ संभोग करता
है, उसे निम्नलिखित रीति के आधार पर दंड दिया जाएगाः
यदि वह अरक्षित थी तब उसका अपराधी अंग कंटवा दिया जाए। यदि वह सुरक्षित थी तब उसे दंड दिया जाए और उसकी संपत्ति अधिग्रहीत कर ली जाए।
पद के संबंध में मनु निर्धारित करता हैः
8.20. कोई भी ब्राह्मण जो जन्म से ब्राह्मण है, अर्थात् जिसने न तो वेदों का अध्ययन
किया है और न वेदों द्वारा अपेक्षित कोई कर्म किया है, वह राजा के अनुरोध पर
उसके लिए धर्म का निर्वचन कर सकता है, अर्थात् न्यायाधीश के रूप में कार्य
कर सकता है, लेकिन शूद्र यह कभी भी नहीं कर सकता, चाहे (वह कितना ही
विद्वान क्यों न हो)।
8.21. जिस राज्य में उसका राजा दर्शक की भांति केवल देखता रहता है और उसकी
उपस्थिति में शूद्र न्याय का विचार करता है, वह राज्य उसी प्रकार अधोगति को
प्राप्त होता है, जिस प्रकार गाय दलदल में नीचे की ओर धंस जाती है।
8.272. अगर कोई शूद्र अहंकारवश ब्राह्मणों को धर्मोपदेश देने की धृष्टता करता है,
तो राजा को चाहिए कि वे उसके मुंह और कान में खौलता तेल डलवा दे।
शूद्रों द्वारा ज्ञान ग्रहण करने के संबंध में मनु की व्यवस्थाएं निम्न प्रकार हैंः
3.456. जो शूद्र शिष्यों को अध्ययन कराता है और जिस किसी का शिक्षक शूद्र
होता है, वह शूद्र को नियुक्त करने के कारण अयोग्य हो जाते हैं।
4.99. उसे शूद्र की उपस्थिति में...... वेदों का कभी भी पाठ नहीं करना चाहिए।
वेदाध्ययन करने पर शूद्रों को दंडित करने के संबंध में मनु के परवर्ती लेखक तो और भी कठोर हैं। उदाहरण के लिए, कात्यायन का कहना है कि यदि कोई शूद्र वेद वाक्य सुन ले अथवा वेद के एक शब्द का भी उच्चारण करे, तो राजा उसकी जिह्वा को दो भागों में चिरवा दे और उसके कान में पिघला हुआ गरम सीसा डलवाए।
शूद्रों द्वारा संपत्ति रखे जाने के संबंध में मनु की व्यवस्था निम्नांकित हैः
10.129. (धनोपार्जन में) समर्थ होने पर भी शूद्र को धन का संग्रह नहीं करना चाहिए
क्योंकि नीच पुरुष, जिसने धन का संग्रह कर लिया है, अहंकारी हो जाता है।
8.417. यदि ब्राह्मण अपनी जीविकोपार्जन के लिए कष्ट में है तो वह निस्संकोच
अपने शूद्र की संपत्ति को अधिग्रहीत कर लें।
- रक्षित का अर्थ है किसी संबंधी के संरक्षण में, और अरक्षित का अर्थ है, अकेले रहना।