306 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
शूद्र केवल एक ही व्यवसाय कर सकता है। मनु के अटल नियमों में यह भी अटल नियम है। मनु कहता हैः
1.91. ब्रह्मा ने शूद्रों के लिए एक ही व्यवसाय नियत किया है - विनम्रतापूर्वक तीन
अन्य वर्गों (अर्थात्) ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करना।
10.121. अगर शूद्र (ब्राह्मणों की सेवा कर जीवन निर्वाह करने में असमर्थ है)
जीविका निर्वाह करना चाहता है, तब वह क्षत्रिय की सेवा करे, या वह धनी वैश्य
की सेवा कर अपनी जीविका के लिए धन अर्जन करे।
10.122. लेकिन वह (शूद्र) ब्राह्मणों की सेवा या तो स्वर्ग प्राप्त करने या दोनों के
लिए (इस जीवन और अगले जीवन के लिए) करें, क्योंकि जो ब्राह्मण का सेवक
कहलाता है, वह अपनी सभी अभिलाषाएं पूरी कर लेता है।
10.123. ब्राह्मणों की सेवा करना ही शूद्रों का एक उत्तम कर्म कहा गया है, क्योंकि
इसके अतिरिक्त वह जो-कुछ करता है, उसका उसे कोई फल नहीं मिलता।
मनु इस बात के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ता कि शूद्रों से दास कर्म कराने के लिए किसी करार का सहारा लिया जाए। यदि कोई शूद्र सेवा करने से इंकार करता है, तो उससे बलपूर्वक कार्य कराने का विधान है, जो इस प्रकार हैः
8.413. प्रत्येक ब्राह्मण शूद्र को दास-कर्म करने के लिए बाध्य कर सकता है, चाहे
उसने उसे खरीद लिया हो अथवा नहीं, क्योंकि शूद्रों की सृष्टि ब्राह्मणों का दास
बनने के लिए ही की गई है।
10.124. ब्राह्मणों को चाहिए कि वे अपने परिवार (की संपत्ति) में से उसे (शूद्र
को) उसकी योग्यता, उसके परिश्रम तथा उन व्यक्तियों की संख्या के अनुसार,
जिनका उसे (शूद्र को) भरण-पोषण करना है, उचित जीविका निश्चित करे।
10.125. उसे (शूद्र को) बचा खुचा अन्न, घर-गृहस्थी का पुराना सामान दिया
जाए।
मनु का कहना है कि शूद्र को चाहिए कि वह अन्य के साथ बातचीत और व्यवहार में विनम्र रहे।
8.270. जो शूद्र द्विज को दारुण वचन कह उसकी निंदा करता है, उसकी जिह्वा
को काटकर फेंक देना चाहिए, क्योंकि वह जन्म से नीच है।
8.271. यदि वह (शूद्र) इनके (द्विजों के) नाम और जाति का इन द्विजातियों के
नाम तथा जाति का उच्चारण कर कटु वचन अपमानजनक रीति से उच्चारण करता
है तब उसके मुख में दहकती हुई लोहे की दस अंगुल लंबी गरम कील घुसेड़ दी
जाए।