4. सुधारक और उनकी नियति - Page 33

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सुधारक और उनकी नियति

यह जिल्दबद्ध लेख टाईप किए हुए 87 पृष्ठ का है। अम्बट्ठ सुत्त पाण्डुलिपि के पृष्ठ संख्या 69 से आरम्भ होता है और पृष्ठ 70 के पश्चात के पृष्ठों को ‘ए’ से ‘जैड’ तक संख्याबद्ध किया हुआ है। लोहिक्क सुत्त पृष्ठ 71 से आरम्भ हुआ हैµसम्पादक

I . आर्य समाज II . बुद्ध और सुधार III.

सर टी. माधव राव ने अपने समय के हिंदू समाज के बारे में कहा थाः जितना

अधिक कोई जीवित रहता है, देखता है और सोचता है, उतनी अधिक गहराई से वह महसूस

करता है कि हिंदू समाज को छोड़कर पृथ्वी पर अन्य कोई समाज नहीं है, जो राजनैतिक

बुराइयों से कम और स्वयं पर थोपी गई या स्वयं स्वीकार की गई या स्वयं पैदा की गई

बुराइयों से अधिक ग्रस्त है और इसलिए इन बुराइयों को दूर किया जा सकता है।

ये विचार बिल्कुल सही रूप से और बिना अतिशयोक्ति के हिंदू समाज में सुधार की आवश्यकता बताते हैं।

प्रथम समाज सुधारक और उनमें सबसे महानतम गौतम बुद्ध थे। समाज सुधार का इतिहास ही बुद्ध से शुरू होता है और कोई भी इतिहास उनकी उपलब्धियां बताए बिना अधूरा रहेगा।

सिद्धार्थ का जन्म शाक्य वंश में उत्तर भारत में नेपाल की सीमा के पास कपिलवस्तु नगर में ईसा पूर्व 563 में हुआ था। उनका कुलनाम गौतम था। वह एक राजकुमार थे। उनकी शिक्षा एक राजकुमार के रूप में हुई थी। उनका विवाह हुआ और उनके एक पुत्र भी था। आर्यों के समाज में बुराइयों और दुःखों से पीडि़त लोगों को देखकर उन्होंने सच्चाई और मुक्ति की खोज के लिए उनतीस वर्ष की उम्र में सांसारिक जीवन त्याग दिया था। उन्होंने चिंतन-मनन किया तथा दो जाने-माने शिक्षकों से शिक्षा ग्रहण की। लेकिन उनकी शिक्षा से संतुष्ट न होने पर, वे शिक्षकों को छोड़कर श्रमण बन गए। इसे भी व्यर्थ समझकर उन्होंने छोड़ दिया। गहराई से सोचने पर उन्हें बोध हुआ। इस अंतर्ज्ञान के आधार पर उन्होंने अपना धम्म (धर्म) प्रतिपादित किया। यह उन्होंने पैंतीस वर्ष की अवस्था में किया। जीवन के अस्सी वर्षों में से बचे हुए समय में उन्होंने अपने धम्म को फैलाया और बौद्ध मठों की नींव रखी तथा भिक्षुओं का संघ बनाकर उसे चलाया। लगभग