सुधारक और उनकी नियति
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ईसा पूर्व 483 में अपने प्रतिबद्ध अनुयायिओं के बीच कुसीनारा में उनकी मृत्यु हो गई।
बोध होने के बाद बुद्ध ने अपना सारा जीवन अपने धम्म चक्र के प्रचार के लिए समर्पित कर दिया। आध्यात्मिक जीवन की ज्ञान-ज्योति प्रज्ज्वलित रखने के लिए एकांत में समाधि लगानेµठीक उसी प्रकार जैसे ईसामसीह एकांत में घंटों प्रार्थना करते थेµबौद्ध भिक्षुओं की बड़ी संख्या को जीवंत उपदेश देने, उनमें से ज्यादा विकसित अनुयायियों को आंतरिक विकास की सूक्ष्म बातें बताने, संघ के कार्य के लिए निर्देश देने, अनुशासन तोड़ने वालों को फटकारने, विश्वासपात्रों के गुणों की पुष्टि करने, शिष्टमंडल का स्वागत करने, विद्वान विरोधियों से बहस करने, दुखी को सांत्वना देने, राजा और किसान से, ब्राह्मण और अछूत से, अमीर और गरीब से मिलने के कार्यों में उनका समय बंटा हुआ था। वे इजारेदार और पापियों पर भी कृपालु थे और कई वैश्याओं ने समझ आने, अन्तर्मन को समझने और दया मिलने से गलत मार्ग त्याग दिया और बुद्ध की शरण में आ गइंर्। इस प्रकार के जीवन के लिए कई प्रकार के नैतिक गुणों तथा सामाजिक प्रतिमानों और अन्य चीजों के अलावा वैभवशाली व्यवहार, कुशलता के साथ प्रजातांत्रिक भावनाओं की आवश्यकता होती है जोकि बहुधा दुर्लभ होती है। वार्तालाप पढ़कर कोई यह नहीं भूल सकता कि गौतम का जन्म और पालन-पोषण एक अभिजात के रूप में हुआ था। वह न केवल ब्राह्मणों और पंडितों से बातचीत करते थे, बल्कि राजकुमारों, मंत्रियों और राजाओं से आसानी व समान रूप से बात करते थे। ‘वह एक अच्छे अतिथि हैं और जिनमें परिहास भाव भी है तथा प्रत्येक द्वार उनके स्वागत को उद्यत होता है।’ उन्हें एक श्रेष्ठ ब्राह्मण ने ऐसे चित्रित किया हैः
फ्पूज्य गौतम दोनों ओर से कुलीन, विशुद्ध वंश के आकर्षक, दिखने
में मनोहर, विश्वास जगाने वाले, रंग-रूप में सुंदर, गौर वर्ण, देखने में
प्रभावशाली, अर्हत के सद्गुणों से सदाचारी, अच्छाई और सद्गुण से
भरपूर, मधुर और विनम्र स्वर, शांत और स्थिर हैं। वह सबका स्वागत
करते हैं, मैत्रीपूर्ण और शांतिकारक हैं, घमंडी नहीं हैं, सब उनसे मिल
सकते हैं, और वे बातचीत में रूढि़वादी नहीं हैं।य्
लेकिन उस समय के भारतवासियों को जिस चीज ने आकर्षित किया और जो चीज युगों से आकर्षित करती आई है, उसे उक्त ब्राह्मण ने निम्न शब्दों में व्यक्त कियाः
फ्गौतम अपने महान वंशजों को त्यागकर, धन और स्वर्ण, जमीन
के दबे हुए और जमीन के ऊपर के खजाने को त्यागकर संन्यासी बने
और उन्होंने धार्मिक जीवन अपनाया। वास्तव में जब वे युवक थे, सिर
पर एक भी सफेद बाल नहीं था, सुंदर व्यक्ति थे, तब उन्होंने घरबार
छोड़कर संन्यासी जीवन में प्रवेश किया।य्
फ्उनके ऐसे जीवन से न केवल प्रीतिकर आचरण, सहानुभूति
और दयालुता की आशा की जाती है, बल्कि दृढ़ता और साहस भी