12. शूद्र और प्रतिक्रांति - Page 330

शूद्र और प्रतिक्रांति

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व्यक्ति सबसे अधिक विज्ञ, सबसे अधिक धनवान या सबसे अधिक शक्तिशाली होता था, वह गृहपति के रूप में कृत्य करता था और शेष व्यक्ति उसका अनुकरण करते थे। गृहपति को अन्य की अपेक्षा अधिक दक्षिणा देनी होती थी।य्

फ्मैं समझता हूं, यह एक ऐसी विधि थी, जिसके माध्यम से एक ही संस्कार कर व्रात्यों को ऋषियों के समाज में सम्मिलित कर लिया जाता था। और ऐसे संस्कारों का आयोजन प्रायः किया जाता था। इस प्रकार झुंड के झुंड खानाबदोश आर्यों को बसाया गया। शुद्ध किए गए व्रात्यों को गृहस्थ बन जाने पर अपने व्रात्य जीवन की संपत्ति अपने साथ रखने की अनुमति नहीं दी जाती थी। उन्हें अपनी संपत्ति उन व्रात्यों के लिए छोड़ देनी पड़ती थी, जो उस समय भी व्रात्य बने रहते थे, अथवा वह मगध देश के तथाकथित ब्राह्मणों को दे दी जाती थी। इस क्षेत्र के बार में मैंने एक अन्य स्थान पर कहा है कि यहां अधिकांश वे लोग रहते थे जिन्हें ऋषिगण नीच समझते थे।य्

फ्किंतु जब व्रात्यों को स्थाई जीवन में स्वीकार कर लिया जाता था, तब उन्हें समान अधिकार प्राप्त हो जाते थे। ऋषि उनके हाथ का बना भोजन करते थे। उन्हें ऋग्, यजुर, साम, तीनों विद्याओं की शिक्षा दी जाती थी, उन्हें वेदों का अध्ययन करने और उनका अध्ययन कराने, अपने तथा दूसरों के लिए यज्ञ करने की अनुमति दे दी जाती थी, अर्थात् वे पूर्ण रूप से समान समझे जाते थे। वे समान ही नहीं माने जाते थे, बल्कि उन्होंने ऋषि जैसी उच्चतम प्रवीणता भी अर्जित की। उन्हें सामवेद का और ऋग्वेद का रहस्य भी ज्ञापित किया गया। इनमें से कौशितकी नाम एक शुद्धीकृत व्रात्य को ऋग्वेद के ब्राह्मणों को संकलित करने की अनुमति दी गई थी। यह संकल्प आज भी उसके नाम से जाना जाता है।य्

आर्य न केवल अपने ढंग से इच्छुक अनार्यों को अपनी जीवन पद्धति में परिवर्तित कर रहे थे, बल्कि वे अनिच्छुक असुरों को भी परिवर्तित कर रहे थे, जो आर्यों, उनकी यज्ञ-संस्कृति और चातुर्वर्ण्य सिद्धांत और यहां तक कि वे उनके वेदों तक के विरोधी थे, जिनका एक पौराणिक कथा के अनुसार असुरों ने आर्यों से हरण कर लिया था। इस संबंध में विष्णु द्वारा हिरण्यकश्यप नामक असुर का वध कर उसके पुत्र प्रह्लाद की इस कारण रक्षा करना कि प्रह्लाद आर्य संस्कृति में दीक्षित होना चाहता था, जबकि हिरण्यकश्यप इसके विरुद्ध था, एक उल्लेखनीय उदाहरण है। अनार्यों को आर्य संस्कृति में परिवर्तित करने और उन्हें अधिकार प्रदान करने के और भी कई उदाहरण हैं। शूद्रों के विरुद्ध विरोधी दृष्टिकोण क्यों अपनाया गया? शूद्र को आर्य संस्कृति में पूर्णतः क्यों सम्मिलित किया गया और पूर्ण अधिकार दिया गया और क्योंकर बहिष्कृत और अधिकार वंचित किया गया? इस पहेली का, निषादों के साथ जो व्यवहार किया गया, उससे कुछ हल निकलता है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में पांच जनजातियों का उल्लेख हुआ है। उनका विभिन्न शीर्षकों में वर्णन है, जैसे पंच कृष्ट्यः, पंच क्षित्यः, मनुष्यः, पंच चार्ष्ण्यः, पंच जनः, पंचजन्म जैसे पंचभूम, पंच जात।