12. शूद्र और प्रतिक्रांति - Page 331

316 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इस बात पर मतभेद है कि इन शब्दों का क्या अर्थ है? ऋग्वेद के भाष्यकार सायणाचार्य का कथन है कि ये चार वर्णों और निषादों के द्योतक हैं। विष्णु पुराण में निषादों की उत्पत्ति के विषय में निम्न कथा आती है µ

‘7. सुनीता नामक कन्या का विवाह अंग के साथ हुआ, जो मृत्यु की पहली पुत्री थी और उससे वेन का जन्म हुआ।

  1. मृत्यु का यह पुत्र जो अपने नाना को मिले शाप से ग्रस्त था, जन्म से ही दुष्ट था, जैसे वह उसकी प्रकृति हो।

  2. जब श्रेष्ठ ऋषियों द्वारा वेन राज पद पर प्रतिष्ठित किया गया तब उसने पृथ्वी पर यह घोषणा करवाई कि कोई भी यज्ञ न करे, न दान दे और न नैवेद्य अर्पित करे। मेरे अतिरिक्त कोई भी यज्ञ की आहुति लेने योग्य नहीं है? ‘मैं सर्वदा के लिए यज्ञ का स्वामी हूं।’

  3. तब सभी ऋषि आदरपूर्वक राजा के पास गए और उन्होंने उससे विनम्रतापूर्वक समझाते हुए कहा-

  4. हे राजन्! हम जो कहते हैं, उसे सुनिए।

  5. हम दीर्घ सत्र नामक यज्ञ कर हरि की पूजा करेंगे, जो देवताओं के अधिपति हैं और जो सभी यज्ञों के स्वामी हैं, इस यज्ञ से आपके साम्राज्य को, आपको और आपकी प्रजा को उच्चतम लाभ होगा। आप सुख से रहें। आपको इस यज्ञ में भाग लेना होगा।

  6. विष्णु जो यज्ञों के स्वामी हैं, इस पूजा से हमारे द्वारा संतुष्ट किए जाने पर आपको आपकी इच्छानुसार सभी फल प्रदान करेंगे। जिन राजाओं के राज्य में हरि, जो यज्ञों के स्वामी हैं, का पूजन कर आदर किया जाता है, उनको सभी वस्तुएं जो वे चाहते हैं, प्रदान करते हैं, ‘वेन ने उत्तर दिया - मुझसे अधिक श्रेष्ठ कौन है? मेरे अतिरिक्त कौन हैं, जिसकी आराधना की जाए? हरि नाम का यह व्यक्ति कौन है जिसे आप यज्ञ का स्वामी कहते हैं? ब्रह्मा, जनार्दन, रुद्र, इंद्र, वायु, यम, रवि, अग्नि, वरुण, धात्रि, पूषण, पृथ्वी, चन्द्रमा - सभी और अन्य देवता जो शाप देते और आशीर्वाद देते हैं, राजा में विद्यमान हैं क्योंकि वह सभी देवताओं से मिलकर बना है। आप इसे जानते हुए मेरे आदेश के अनुसार कार्य कीजिए। ब्राह्मणों, आप न तो कोई दान दें, न पूरा करें और न बलि दें।

  7. जिस प्रकार पत्नियों का परम कर्तव्य अपने-अपने पतियों की आज्ञा का पालन करना है, उसी प्रकार आपको मेरी आज्ञा का पालन करना चाहिए। ऋषियों ने उत्तर दिया, ‘हे महाराज, हमें अनुमति दीजिए, धर्म की हत्या न होने दीजिए, यह सारा संसार पूजा-अर्चना का परिष्कृत रूप है।’