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नारी और प्रतिक्रांति

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9.16. उनका ऐसा स्वभाव जानकर, जो ब्रह्मा ने उन्हें अपनी सृष्टि के समय दिया है, प्रत्येक मनुष्य को उनकी रक्षा के लिए विशेष प्रयत्न करना चाहिए। 9.17. मनु ने स्त्रियों की सृष्टि करते समय इनमें (अपनी) शैया, (अपने)स्थान और (अपने) आभूषणों के लिए प्रेम, वासना, बेइमानी, ईर्ष्या और दुराचरण निहित किया है।

स्त्रियों के प्रति मनु के ये नियम अकाट्य हैं। स्त्रियां किसी भी परिस्थिति में स्वतंत्र नहीं हैं। मनु के मतानुसारः

9.2. स्त्रियां उनके परिवारों के पुरुषों द्वारा दिन-रात अधीन रखी जानी चाहिएं और यदि वे अपने को विषयों में आसक्त करें तो उन्हें अपने नियंत्रण में अवश्य रखें। 9.3. स्त्री की रक्षा उसके बचपन में उसका पिता करता है, युवावस्था में उसका पति, जब उसका पति दिवंगत हो जाता है, वृद्धावस्था में उसके पुत्र (उसकी रक्षा करते हैं)। स्त्री कभी स्वतंत्र रहने योग्य नहीं है।

9.5. स्त्रियों की रक्षा विशेषकर दुष्प्रवृत्ति से की जानी चाहिए जो चाहे जितनी भी नगण्य (क्यों न प्रतीत हों), क्योंकि यदि उनकी रक्षा नहीं की गई तो वे दोनों परिवारों (पिता तथा पति) के क्लेश का कारण बन जाती है।

9.6. वर्णों का उत्तम धर्म समझते हुए, दुर्बल पतियों को भी अपनी पत्नी की रक्षा करने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए।

5.147. लड़की को, नवयुवती को या वृद्धा को भी अपने घर में भी कोई काम स्वतंत्रतापूर्वक नहीं करना चाहिए।

5.148. स्त्री को बचपन में अपने पिता, युवावस्था में अपने पति और जब उसका पति दिवंगत हो जाए तब अपने पुत्रों के अधीन रहना चाहिए, स्त्री को कभी भी स्वतंत्र नहीं रहना चाहिए।

5.149. स्त्री को अपने पिता, पति या पुत्रों से अपने को अलग करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए, इनको त्याग कर वह दोनों परिवारों (उसका अपना परिवार और पति का परिवार) को निंदित कर देती है।

स्त्री को अपने पति को छोड़ देने का अधिकार नहीं मिल सकता। 9.45. पति अपनी पत्नी के साथ एक इकाई है। इसका तात्पर्य यह है कि स्त्री एक बार विवाहित होने के बाद, कोई विच्छेद नहीं हो सकता।

बहुत से हिंदू यहीं रुक जाते हैं, जैसे विवाह-विच्छेद के बारे में मनु के नियम का यही सार-तत्व हो और इसे आदर्श कहते रहते हैं। वह यह सोचकर अपने विवेक पर पर्दा