नारी और प्रतिक्रांति
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2.66. स्त्री के लिए भी सभी संस्कारों का किया जाना जरूरी है और वे किए जाने
चाहिए। लेकिन ये वेदमंत्रों के बिना किए जाने चाहिए।
9.18. स्त्रियों को पढ़ने का कोई अधिकार नहीं है। इसलिए उनके संस्कार वेद मंत्रों
के बिना किए जाते हैं। स्त्रियों को वेद जानने का अधिकार नहीं है इसलिए उन्हें
धर्म का कोई ज्ञान नहीं होता। पाप दूर करने के लिए वेद मंत्रों का पाठ उपयोगी है।
चूंकि स्त्रियां वेद मंत्रों का पाठ नहीं कर सकतीं, वे उसी प्रकार अपवित्र हैं, जिस
प्रकार असत्य अपवित्र होता है।
ब्राह्मण धर्म के अनुसार, यज्ञ करना धर्म का सार है, फिर भी मनु स्त्रियों को यज्ञ करने की अनुमति नहीं देता। मनु निर्देश देता हैः
11.36. स्त्री वेद विहित दैनिक अग्निहोत्र नहीं करेगी।
11.37. यदि वह करती है, तब वह नरक में जाएगी।
मनु स्त्रियों को ब्राह्मण, पुरोहितों की सहायता व उनकी सेवा ग्रहण करने से वर्जित करता है, जिससे वह यज्ञ कर्म न कर सकें।
4.205. ब्राह्मण उस यज्ञकर्म में दिए गए भोजन को ग्रहण न करें, जो किसी स्त्री
द्वारा किया गया हो।
4.206. जो यज्ञ कर्म स्त्रियों द्वारा किए जाते हैं, वे अशुभ और देवताओं को अस्वीकार्य
होते हैं। अतः उसमें भाग नहीं लेना चाहिए।
स्त्रियों को कोई बौद्धिक कार्य नहीं करना चाहिए। उनको स्वतंत्र इच्छा नहीं करनी चाहिए, न ही उन्हें अपने विचारों में स्वतंत्र होना चाहिए। वह कोई अन्य धर्म, जैसे बौद्ध धर्म स्वीकार नहीं कर सकतीं। यदि वह आजीवन उसका पालन करती हैं, तब उन्हें जल का तर्पण नहीं किया जाएगा, जो अन्य मृतकों के लिए किया जाता है।
अंत में जीवन के उस आदर्श को भी देखिए, जो मनु स्त्रियों के लिए निर्धारित करता है। उसे उसी के शब्दों में कहना उचित होगाः
5.151. वह आजीवन उसकी (पति की) आज्ञा का अनुपालन करेगी जिसे उसका
पिता या उसका भाई अपने पिता की अनुमति से उसे सौंप देगा, और जब वह दिवंगत
हो जाए तब वह उसके श्राद्ध आदि कर्म का उल्लंघन नहीं करेगी।
5.154. चाहे पति सदाचार से हीन हो, या वह अन्य में आसक्त हो या वह सद्गुणों
से हीन हो, तो भी पतिव्रता स्त्री के द्वारा पति देवता के समान पूजित होता है।
5.155. स्त्री पति से पृथक कोई यज्ञ, कोई व्रत या उपवास न करे यदि स्त्री अपने
पति का अनुपालन करती है, तब वह इस कारण ही स्वर्ग में पूजित होती है।