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नारी और प्रतिक्रांति

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के गृह सूत्र में कहा गया है कि कन्या वयःसंधि के बाद विवाह योग्य हो जाती है ख्2, और विवाह के समय जब वह रजःस्वला हो, तब प्रायश्चित कर्म का विशेष विधान किया गया है।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में स्त्री-पुरुष के संभोग के लिए आयु के संबंध में कोई नियम नहीं है। इसका कारण यह है कि विवाह वयःसंधि की अवस्था के बाद होता था। उनकी अधिक चिंता ऐसी घटनाओं को लेकर थी, जिनमें वर-वधू का विवाह हो जाता है और यह बात छिपा ली जाती है कि उन्होंने विवाह से पहले किसी दूसरे के साथ संभोग किया था, या रजःस्वला वधू संभोग कर चुकी है। पहली स्थिति के संबंध में कौटिल्य कहते हैंः ख्3,

‘यदि किसी व्यक्ति ने अपनी पुत्री का विवाह यह बताए बिना कर दिया है कि उसकी पुत्री का किसी अन्य व्यक्ति से शारीरिक संबंध था, तब उस पर न केवल आर्थिक दंड निर्धारित किया जाए, बल्कि उसे शुल्क और स्त्री धन भी लौटाना होगा। यदि कोई पुरुष यह बताए बिना किसी कन्या से विवाह करता है कि उसके किसी अन्य नारी से शारीरिक संबंध थे तो वह न केवल उक्त आर्थिक दंड का दुगना धन दंड स्वरूप देगा, बल्कि जो शुल्क और स्त्री धन उसने वधू को दिया है, वह भी जब्त हो जाएगा। दूसरे मामले में कौटिल्य ख्4, का नियम इस प्रकार हैः

‘यदि कोई व्यक्ति अपनी समान जाति और श्रेणी की ऐसी नारी से संभोग करता है जो पहली बार रजःस्वला होने के बाद तीन वर्ष से अविवाहित है, तो उसका यह कर्म अपराध नहीं है। इसी प्रकार यदि कोई अपनी जाति से भिन्न जाति की ऐसी नारी के साथ संभोग करता है जो पहली बार रजःस्वला होने के बाद तीन वर्ष से अविवाहित है और उसके पास आभूषणादि नहीं हैं, तब यह कर्म कोई अपराध नहीं है।’

मनु के विपरीत कौटिल्य एक विवाह-प्रथा की व्यवस्था करता है। पुरुष कुछ ही परिस्थितियों में दूसरा विवाह कर सकता है। कौटिल्य ने इसकी शर्तें बताई हैं जो निम्नलिखित हैंः ख्5,

‘यदि कोई नारी (जीवित) बालक को जन्म नहीं दे पाती है, या जिसके पुत्र नहीं है, अथवा कोई स्त्री बांझ है, तो उसका पति दूसरा विवाह करने से पूर्व आठ वर्ष तक

  1. शाम शास्त्रीµकौटिल्य का अर्थशास्त्र, पृ. 175

  2. बौद्धायन, 1.7.22

  3. शाम शास्त्रीµकौटिल्य का अर्थशास्त्र, पृ. 222

  4. वही, पृ. 259

  5. जायसवालµइंडियन पॉलिटी, भाग 2, पृ. 16