324 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्रतीक्षा करे। यदि कोई नारी मृत बालक को जन्म देती है तो उसे दस वर्षों तक प्रतीक्षा करनी चाहिए। यदि वह केवल पुत्रियों को ही जन्म देती है तो उसे 12 वर्ष तक प्रतीक्षा करनी होगी। तब यदि वह पुत्र की कामना करता हो तो वह दूसरा विवाह कर सकता है। इस नियम के उल्लंघन पर उसे स्त्री को न केवल शुल्क और उसका स्त्री-धन देना होगा और आर्थिक क्षतिपूर्ति करनी होगी, बल्कि उसे राज्य को 24 पण दंड स्वरूप भी देने होंगे। अपनी पत्नियों को अनुपातिक क्षतिपूर्ति और समुचित वृत्ति देने के बाद वह कितनी ही स्त्रियों से विवाह कर सकता है, क्योंकि स्त्री का जन्म पुत्रोत्पत्ति के लिए होता है।’
मनु के विपरीत कौटिल्य के युग में नारी अपने पति के साथ परस्पर वैर और घृणा होने के कारण विवाह-विच्छेद कर सकती थी।
‘जो नारी अपने पति से घृणा करती है, वह उस पति की इच्छा के विरुद्ध अपना विवाह संबंध नहीं तोड़ सकती। वह पति भी अपनी इच्छा से अपनी स्त्री की इच्छा के बिना उसका परित्याग नहीं कर सकता। परंतु परस्पर वैर होने पर विवाह-विच्छेद होता है। यदि एक पुरुष अपनी पत्नी से खतरा अनुभव करता है और उससे विवाह-विच्छेद करना चाहता है तो वह उसे वह संपत्ति देगा, जो उसे नारी के विवाह के अवसर पर प्राप्त हुई थी। यदि कोई नारी अपने पति से खतरा अनुभव करती है और उससे विवाह-विच्छेद करना चाहती है तो उसका अपनी संपत्ति पर कोई अधिकार शेष नहीं रहेगा। प्रत्येक पत्नी अपना विवाह-विच्छेद कर सकती है, यदि उसका पति दुश्चरित्र है।’
‘जिस नारी को अनिश्चित काल तक भरण-पोषण मिलने का अधिकार है, उसे उसकी आवश्यकतानुसार या उसकी आय के अनुपात में अधिक आवश्यकतानुसार अन्न और वस्त्र उपलब्ध कराए जाएं। यदि यह अवधि जिसमें ये वस्तुएं और इसके अलावा धन-राशि का 1/10 भाग भी दिया जाना सीमित है, तो धन का एक निश्चित भाग जो भर्ता की आय के अनुपात में निश्चित किया गया हो, वह उस नारी को दिया जाए, बशर्ते उसे शुल्क (जो उसे उसके पति को पुनर्विवाह की अनुमति के कारण देय है) स्त्री धन और क्षतिपूर्ति की राशि नहीं दी गई हो। यदि वह अपने श्वसुर-कुल के किसी व्यक्ति के संरक्षण में रहना चाहती है, अथवा वह स्वतंत्र रहना आरंभ कर देती है, तब उसके भरण-पोषण के लिए उसके पति पर दावा नहीं किया जा सकता। इस प्रकार भरण-पोषण का निर्धारण होता है।’
कौटिल्य के समय में किसी नारी अथवा विधवा के पुनर्विवाह पर कोई प्रतिबंध नहीं था।
‘यदि कोई नारी अपने पति की मृत्यु के बाद धर्मपरायण जीवनयापन करना चाहती है, तो वह तुरंत न केवल अपनी स्थाई निधि और स्त्री धन को प्राप्त करेगी, बल्कि देय