नारी और प्रतिक्रांति
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शुल्क बकाया भी प्राप्त करेगी। यदि इन दोनों को प्राप्त करने के बाद वह पुनर्विवाह कर लेती है, तो उस नारी को इन दोनों को (उनके मूल्य पर) ब्याज सहित लौटाना होगा। यदि वह दूसरा विवाह करना चाहती है, तो उसको पुनर्विवाह के समय वह सब दिया जाएगा, जो उसे उसके श्वसुर या उसके पति अथवा दोनों ने दिया था। नारियां कब पुनर्विवाह कर सकती हैं, यह अपने-अपने पतियों के साथ बिताए गए दीर्घ समय के बारे में स्पष्ट किया जाएगा।
‘यदि कोई विधवा अपने श्वसुर द्वारा चुने गए पुरुष के बजाए किसी अन्य पुरुष के साथ विवाह करती है, तो वह उस संपत्ति से वंचित हो जाएगी, जो उसे अपने श्वसुर अथवा मृत पति से प्राप्त हुई होगी।’
‘जब कोई नारी किसी जाति (नातेदार) से पुनर्विवाह करती है, तब उस पति के जाति (नातेदार) उसके पुराने श्वसुर को वह सब संपत्ति लौटा देंगे जो उस नारी की अपनी होती थी। जो किसी नारी को न्यायतः अपने संरक्षण में लेता है, वह उसकी संपत्ति का भी संरक्षण करेगा। जो नारी पुनर्विवाह करती है, वह अपने मृत पति की संपत्ति पर अधिकार करने में सफल नहीं होगी। धर्मपरायण जीवन व्यतीत करती है, तो उसे ऐसा अधिकार होगा। कोई भी नारी पुत्र या पुत्रों सहित (पुनर्विवाह करने के बाद) अपनी संपत्ति (स्त्री धन) का स्वेच्छापूर्वक उपयोग करने में स्वतंत्र नहीं है, क्योंकि उसकी संपत्ति उसके पुत्रों को प्राप्त होगी।’
‘यदि कोई नारी पुनर्विवाह के पश्चात् इस तर्क पर अपनी संपत्ति लेना चाहे कि उसे अपने पुत्रों का भरण-पोषण करना है जो उसने अपने पूर्व पति से जन्मे थे, तो उसे वह संपत्ति उनके नाम करनी होगी। यदि किसी नारी के कई पुत्र हों और वे कई पतियों से उत्पन्न हुए हों, तो वह अपनी संपत्ति पर वैसे ही अधिकार कर सकती है, जैसे कि वह उसे अपने पतियों से प्राप्त हुई हो। जो नारी पुनः विवाह करती है, वह उस संपत्ति को भी अपने पुत्रों के नाम करेगी, जो उसे पूर्ण अधिकार सहित प्राप्त हुई है।’
‘जो बांझ विधवा अपने मृत पति में आस्था रखती है, वह अपने गुरु के संरक्षण में रहकर आजीवन अपनी संपत्ति का उपभोग कर सकती है, जिससे उसे उन आपदाओं का सामना न करना पड़े, जो नारियों को संपत्ति के संबंध में झेलनी पड़ती हैं। उसकी मृत्यु पर उसकी संपत्ति, उसके दायदा को प्राप्त होगी। यदि उसका पति जीवित है और पत्नी की मृत्यु हो गई है, तो उस नारी के पुत्र और पुत्रियां आपस में संपत्ति का विभाजन करेंगे। यदि पुत्र नहीं है तो वह संपत्ति उसकी पुत्रियों को मिलेगी। यदि पुत्री भी न हो, तो उसका पति वह संपत्ति (शुल्क) प्राप्त करेगा जो उसने अपनी पत्नी को दिया हो और उसके संबंधी उस सामग्री को प्राप्त करेंगे जो उन्होंने दान अथवा दहेज के रूप में उसे दी थी। इस प्रकार नारी की संपत्ति के निर्धारण की व्यवस्था की गई है।