14. बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स - Page 347

332 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बुद्ध का सिद्धांत

बुद्ध का नाम सामान्यतः अहिंसा के सिद्धांत के साथ जोड़ा जाता है। अहिंसा को ही उनकी शिक्षाओं व उपदेशों का समस्त सार माना जाता है। उसे ही उनका प्रारंभ व अंत समझा जाता है। बहुत कम व्यक्ति इस बात को जानते हैं कि बुद्ध ने जो उपदेश दिए, वे बहुत ही व्यापक हैं, अहिंसा से बहुत बढ़ कर हैं। अतएव यह आवश्यक है कि उनके सिद्धांतें को विस्तारपूर्वक प्रस्तुत किया जाए। मैंने त्रिपिटक का अध्ययन किया। उस अध्ययन से मैंने जो समझा, मैं आगे उसका उल्लेख कर रहा हूंः

  1. मुक्त समाज के लिए धर्म आवश्यक है।

  2. प्रत्येक धर्म अंगीकार करने योग्य नहीं होता।

  3. धर्म का संबंध जीवन के तथ्यों व वास्तविकताओं से होना चाहिए, ईश्वर

या परमात्मा या स्वर्ग या पृथ्वी के संबंध में सिद्धांतों तथा अनुमान मात्र

निराधार कल्पना से नहीं होना चाहिए।

  1. ईश्वर को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।

  2. आत्मा की मुक्ति या मोक्ष को धर्म का केन्द्र बनाना अनुचित है।

  3. पशुबलि को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।

  4. वास्तविक धर्म का वास मनुष्य के हृदय में होता है, शास्त्रों में नहीं।

  5. धर्म के केंद्र मनुष्य तथा नैतिकता होने चाहिए। यदि नहीं, तो धर्म एक क्रर

अंधविश्वास है।

  1. नैतिकता के लिए जीवन का आदर्श होना ही पर्याप्त नहीं है। चूंकि ईश्वर

नहीं है, अतः इसे जीवन का नियम या कानून होना चाहिए।

  1. धर्म का कार्य विश्व का पुनर्निमाण करना तथा उसे प्रसन्न रखना है, उसकी

उत्पत्ति या उसके अंत की व्यख्या करना नहीं।

  1. कि संसार के दुःख स्वार्थों के टकराव के कारण होता है, और इसके

समाधान का एकमात्र तरीका अष्टांग मार्ग का अनुसरण करना है।

  1. कि संपत्ति के निजी स्वामित्व से अधिकार व शक्ति एक वर्ग के हाथ में

आ जाती है और दूसरे वर्ग को दुख मिलता है।

  1. कि समाज के हित के लिए यह आवश्यक है कि इस दुःख का निदान

इसके कारण का निरोध करके किया जाए।

  1. सभी मानव प्राणी समान हैं।