342 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मित्र, पशु हो या मनुष्य, सभी के प्रति होती है।
उपेक्खा अनासक्ति है, जो उदासीनता से भिन्न होती है। यह मन की वह अवस्था है, जिसमें न तो किसी वस्तु के प्रति रुचि होती है, परिणाम से विचलित व अनुतेजित हुए बिना उसकी खोज व प्राप्ति में लगे रहना ही उपेक्खा है।
प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह इन गुणों को अपनी पूर्ण सामर्थ्य के साथ अपने व्यवहार में अपनाए। इन पर आचरण करे। यही कारण है कि इन्हें परिमिता (पूर्णता की स्थिति) कहा जाता है। यही वह सिद्धांत है, जिसे बुद्ध ने संसार में दुःख तथा क्लेश की समाप्ति के लिए अपने बोध व ज्ञान के परिणामस्वरूप प्रतिपादित किया है।
स्पष्ट है कि बुद्ध ने जो साधन अपनाए, वे स्वेछापूर्वक अनुसरण करके मनुष्य की नैतिक मनोवृत्ति को परिवर्तित करने के लिए थे।
साम्यवादियों द्वारा अपनाए गए साधन भी इसी भांति स्पष्ट, संक्षिप्त तथा स्फूर्तिपूर्ण हैं। ये हैंः (1) हिंसा, और (2) सर्वहारा वर्ग की तानाशाही।
साम्यवादी कहते हें कि साम्यवाद को स्थापित करने के केवल दो साधन है, पहला है हिंसा। वर्तमान व्यवस्था को भंग करने व तोड़ने के लिए इससे कम कोई भी कार्य या योजना पर्याप्त नहीं होगी। दूसरा साधन है, सर्वहारा वर्ग की तानाशाही। नई व्यवस्था को जारी रखने के लिए उससे कम कोई चीज पर्याप्त नहीं होगी।
स्पष्ट हो जाता है कि बुद्ध तथा कार्ल मार्क्स में क्या समानताएं हैं तथा क्या विषमताएं हैं। अंतर व विषमता साधनों के विषय में है। साध्य दोनों में समान हैं। साधनों का मूल्यांकन
अब हमें साधनों के मूल्यांक का विवेचन करना चाहिए। हमें इस बात को देखना चाहिए कि किसके साधन श्रेष्ठ तथा दीर्घ काल तक ठहरने व स्थाई बने रहने वाले हैं। किंतु दोनों ओर कुछ भ्रांतियां हैं। उनको स्पष्ट करना आवश्यक है।
हिंसा को लीजिए। जहां तक हिंसा का संबंध है, हिंसा का नाम सुनते ही उसके विचार से बहुत से लोगों को कंपकंपी आ जाएगी। पंरतु यह केवल भावुकता है। हिंसा का पूर्णतया त्याग नहीं किया जा सकता। यहां तक कि गैर-साम्यवादी देशों में भी हत्यारे को फांसी पर लटकाया जाता है। क्या फांसी पर लटकाना हिंसा नहीं है? गैर-साम्यवादी देश एक-दूसरे के साथ युद्ध करते हैं। युद्ध में लाखों लोग मारे जाते है। क्या यह हिंसा नहीं है? यदि एक हत्यारे को इसलिए मारा जा सकता है, क्योंकि उसने एक नागरिक को मारा है, उसकी हत्या की है, यदि एक सिपाही को युद्ध में इसलिए मारा जा सकता है, क्योंकि वह शत्रु-राष्ट्र से संबंधित है, तो यदि संपत्ति का स्वामी स्वामित्व के कारण शेष मानव-जाति को दुःख पहुंचाता है, तो उसे क्यों नहीं मारा जा सकता? संपत्ति के