14. बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स - Page 358

बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स

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स्वामी के लिए उसके पक्ष में बचाव करने का कोई कारण नहीं है। व्यक्तिगत संपत्ति को परमपावन क्यों माना जाना चाहिए?

बुद्ध हिंसा के विरुद्ध थे। परंतु वह न्याय के पक्ष में भी थे और जहां पर न्याय के लिए बल प्रयोग अपेक्षित होता है, वहां उन्होंने बल प्रयोग करने की अनुमति दी है। यह बात वैशाली के सेनाध्यक्ष सिंहा सेनापति के साथ उनके वार्तालाप में भलीभांति सोदाहरण समझाई गई है। इस बात को जानने के बाद कि बुद्ध अहिंसा का प्रचार करते है, सिंहा उनके पास गया और उनसे पूछाः

‘‘भगवन अहिंसा का उपदेश देते व प्रचार करते हैं क्या भगवन एक दोषी को

दंड से मुक्त करने व स्वतंत्रता देने का उपदेश देते व प्रचार करते हैं? क्या भगवान

यह उपदेश देते हैं कि हमें अपनी पत्नियों, अपने बच्चों तथा अपनी संपत्ति को

बचाने के लिए, उनकी रक्षा करने के लिए युद्ध नहीं करना चाहिए? क्या अहिंसा

के नाम पर हमें अपराधियों के हाथों कष्ट झेलते रहना चाहिए? क्या तथागत उस

समय भी युद्ध का निषेध करते हैं, जब वह सत्य तथा न्याय के हित में हो?’’

बुद्ध ने उत्तर दियाः

‘‘मैं जिस बात का प्रचार करता हूं व उपदेश देता हूं, आपने उसे गलत ढंग

में समझा है। एक अपराधी व दोषी को दंड अवश्य दिया जाना चाहिए। और एक

निर्दोष व्यक्ति को मुक्त व स्वतंत्र कर दिया जाना चाहिए। यदि एक दंडाधिकारी

एक अपराधी को दंड देता है, तो यह दंडाधिकारी का दोष नहीं है। दंड का कारण

अपराधी का दोष व अपराध होता हे। जो दंडाधिकारी दंड देता है, वह न्याय का ही

पालन कर रहा होता है। उस पर अिंहंसा का कलंक नहीं लगता। जो व्यक्ति न्याय

तथा सुरक्षा के लिए लड़ता है, उसे अहिंसा का दोषी नहीं बनाया जा सकता। यदि

शांति बनाए रखने के सभी साधन असफल हो गए हों, तो हिंसा का उत्तरदायित्व

उस व्यक्ति पर आ जाता है, जो युद्ध को शुरू करता है। व्यक्ति को दुष्ट शक्तियों

के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए। यहां युद्ध हो सकता है। परंतु यह स्वार्थ

की या स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों की शर्तों के लिए नहीं होना चाहिए।’’

इसमें संदेह नहीं कि हिंसा के विरुद्ध अन्य ऐसे आधार भी हैं, जिन पर प्रो0 जॉन डिवी द्वारा बल दिया गया है। जिन लोगों का यह तर्क है कि साध्यों की सफलता साधन को उचित सिद्ध करती है, तो यह नैतिक रूप से एक विकृत सिद्धांत है, उनसे डिवी ने यह ठीक ही पूछा है कि यदि साध्य नहीं, तो फिर साधनों को कौन-सी चीज उचित सिद्ध करती है? केवल साध्य ही साधनों को उचित सिद्ध कर सकता व न्यायोचित ठहरा सकता है। बुद्ध कदाचित इस बात को स्वीकार कर लेते हैं कि यह केवल साध्य ही है, जो साधनों को उचित सिद्ध करता है। इसके अलावा और क्या