14. बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स - Page 359

344 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

चीज उचित सिद्ध कर सकती है। और उन्होंने यह कहा होता कि यदि साध्य हिंसा को उचित ठहराता है, तो प्रत्यक्ष उपस्थित की पूर्ति साध्य के लिए हिंसा एक उचित साधन है। यदि बल-प्रयोग साध्य को प्राप्त करने का एकमात्र साधन होता, तो वह निश्चय ही संपत्ति के स्वामियों को बल का प्रयोग करने की छूट न देते। इससे पता चलता है कि साध्य के लिए उनके साधन भिन्न थे। प्रो0 डिवी ने कहा है कि हिंसा बल-प्रयोग का केवल एक दूसरा नाम है और यद्यपि बल का प्रयोग सृजनात्मक उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए, परंतु शक्ति के रूप में बल-प्रयोग तथा हिंसा के रूप में बल-प्रयोग के बीच अंतर समझाना आवश्यक है। एक साध्य की उपलब्धि में अन्य अनेक साध्यों का विनाश शामिल होता है, जो उस साध्य से अभिन्न होते हैं, जिसे नष्ट करने का प्रयास किया जाता है। बल-प्रयोग को इस प्रकार नियमित करना चाहिए कि वह अनिष्टकर साध्य को नष्ट करने की प्रक्रिया में यथासंभव अधिक से अधिक साध्यों की रक्षा कर सके। बुद्ध की अहिंसा उतनी निरपेक्ष नहीं थी, जितनी जैन मत के संस्थापक महावीर की अहिंसा थी। उन्होंने केवल शक्ति के रूप में बल-प्रयोग की अनुमति दी होगी। साम्यवादी हिंसा का प्रतिपादन एक निरपेक्ष सिद्धांत के रूप में करते हैं। बुद्ध इसके घोर विरोधी थे।

जहां तक तानाशाही का संबंध है, बुद्ध इसका बिल्कुल समर्थन नहीं करते । वह लोकतंत्रवादी के रूप में पैदा हुए थे और लोकतंत्रवादी के रूप में ही मरे। उनके समय में चौदह राजतंत्रीय राज्य थे और चार गणराज्य थे। वह शाक्य थे और शाक्यों का राज्य एक गणराज्य था। उन्हें वैशाली से अत्यंत अनुराग था, जो उनका द्वितीय घर था, क्योंकि वह एक गणराज्य था। उन्होंने महानिर्वाण से पूर्व अपना वर्षावास वैशाली में व्यतीत किया था। अपने वर्षावास के पूरा हो जाने के बाद उन्होंने वैशाली को छोड़कर कहीं और जाने का निश्चय किया, जैसी उनकी आदत थी। कुछ दूर जाने के बाद, उन्होंने मुड़कर वैशाली की ओर देखा और फिर आनंद से कहा, ‘तथागत वैशाली के अंतिम बार दर्शन कर रहे हैं।’ उससे पता चलता है कि इस गणराज्य के प्रति उनका कितना लगाव व प्रेम था।

वह पूर्णतः समतावादी थे। भिक्षु और स्वयं बुद्ध भी मूलतः जीर्ण-शीर्ण-वस्त्र (चीवर) पहनते थे। इस नियम को इसलिए प्रतिपादित किया गया था, ताकि कुलीन वर्ग के लोगों को संघ में शामिल होने से रोका जा सके। बाद में जीवक नामक एक प्रसिद्ध वैद्य ने अनुनय कर बुद्ध को थान से निर्मित वस्त्र को स्वीकार करने के लिए सहमत कर लिया। बुद्ध ने मूल नियम को तुरंत बदल दिया और उसे सब भिक्षुओं के लिए भी लागू कर दिया।

एक बार बुद्ध की मां महाप्रजापति गौतमी ने, जो भिक्षुणी संघ में शामिल हो गई थीं, सुना कि बुद्ध को सर्दी लग गई है। उन्होंने उनके लिए एक गुलूबंद तैयार करना तुरंत