14. बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स - Page 363

348 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

स्नान कर सबसे ऊपर वाले छज्जे पर चंद्र दर्शन के लिए जाओ, तब दिव्य चक्र अपने सहस्त्रों अरो, चक्रनाभि तथा अपने संपूर्ण अवयवों के साथ पूर्ण रूप में प्रकट हो जाएगा।’

(5) ‘किंतु महाराज, चक्र-प्रवर्तक राजा का आर्य श्रेष्ठ कर्तव्य क्या है?’

‘प्रिय पुत्र, यह कर्तव्य यह है कि आदर्श, सत्य तथा धर्मपरायणता के नियम को सामने रख उसको सम्मान, सत्कार तथा आदर प्रदान कर, उसके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित कर, श्रद्धापूर्वक स्वयं आदर्श बन, आदर्श को अपना स्वामी मानकर, अपनी जनता, सेना विद्वान वर्ग के लोगों, सेवकों तथा आश्रितों, ब्राह्मणों तथा ग्रहस्थों, नगर तथा ग्रामवासियों, धार्मिक लोगों तथा पशु पक्षियों को सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए और उनकी अच्छी प्रकार से रखवाली तथा देख-रेख करनी चाहिए। तुम्हारे समूचे राज्य में कोई भी काम गलत व अनुचित नहीं होना चाहिए और तुम्हारे राज्य में जो भी व्यक्ति निर्धन है, उसको धन दिया जाए।

‘और प्रिय पुत्र, तुम्हारे राज्य में धार्मिक व्यक्ति, स्वस्थ व्यक्ति तथा सहिष्णु व्यक्ति, और स्वार्थहीन व्यक्ति और आत्म रक्षा करने वाला व्यक्ति, जब समय-समय पर तुम्हारे पास आए और वह पूछे कि क्या अच्छा है और क्या बुरा है, क्या अपराध है और क्या नहीं, क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, सुख-दुःख के लिए अंततोगत्वा कौन-सी कार्यप्रणाली सफल होगी? जब वह उक्त प्रकार के प्रश्न करे, तब तुम्हें उसकी बात सुननी चाहिए और तुम्हें उनको बुराई व पाप से रोकना चाहिए और उनको जो अच्छे काम हैं, करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। प्रिय पुत्र संसार के राजा का यह ही आर्य कर्तव्य है।’

अभिषिक्त राजा ने कहा, ‘एसा ही होगा।’ उसने आज्ञा का पालन करते हुए राजा के श्रेष्ठ कर्तव्य का पालन किया। इस प्रकार आचरण करते हुए वह चंद्र पर्व पर, स्नान कर, अनुष्ठान करने के लिए सबसे ऊपरी छज्जे पर गया, तो दिव्य चक्र अपने सहस्त्रों अरों (स्पोक्स), चक्रनाभि तथा अपने संपूर्ण अवयवों सहित प्रकट हुआ। उसे देखकर राजा के मन मे आया, ‘मुझे यह बताया गया है कि जिस राजा के समक्ष ऐसे अवसर पर यदि दिव्य चक्र स्वयं पूर्ण रूप में प्रकट होता है, तो वह राजा चक्र प्रवर्तक प्रभुता संपन्न राजा हो जाता है। मैं भी संसार का सर्व-प्रभुत्व संपन्न राजा बन सकता हूं।’

(6) इसके बाद बंधुओ, वह राजा अपने स्थान से उठा और उसने अपने एक कंधे से वस्त्र हटाकर अपने बाएं हाथ में एक घड़ा लिया और अपने दाएं हाथ से चक्र पर जल छिड़का और यह कहा, ‘हे दिव्य चक्र! आगे बढ़ो और विजय प्राप्त करो।’