बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स
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फिर बंधुओ, दिव्य चक्र पूर्व दिशा की ओर बढ़ा और इसके बाद वह चक्र प्रवर्तक राजा उसके पीछे-पीछे, उसके साथ उसकी सेना, अश्व, रथ तथा हाथी और मनुष्य गए। जिस भी स्थान पर, बंधुओ, वह चक्र रुका, उसी स्थान पर, वह राजा युद्ध में विजयी हुआ। उस राजा ने तथा उसके साथ उसकी चतुरंगिनी सेना ने वहीं अपना आवास बनाया। इसके बाद उस प्रदेश के अन्य प्रतिद्वंद्वी राजा उस चक्रवर्ती राजा के पास आए और उससे कहा, ‘आइए, हे महान राजन। आपका स्वागत है, यहां सब कुछ आपका है, हमें शिक्षा दीजिए।’
उस चक्रवर्ती राजा एवं योद्धा ने इस प्रकार कहा, ‘आप किसी प्राणी की हत्या नहीं करेंगे । जो आपको नहीं दिया गया है, आप उसे नहीं लेंगे। आप इच्छाओं के गलत व अनुचित कार्य नहीं करेंगे। आप झूठ नहीं बोलेंगे। आज कोई मादक पेय नहीं पिएंगे। आप अपनी संपत्ति व अधिकारों का उसी प्रकार प्रयोग न करें, जैसा कि आप अभ्यस्त हैं।’
(7) इसके बाद, बंधुओ, दिव्य चक्र पूर्वी महासागर में डुबकी लगाकर बाहर निकला और फिर दक्षिण प्रदेश की ओर बढ़ा (और यहां सब कुछ उसी प्रकार, वैसा ही हुआ जैसा पूर्व प्रदेश में हुआ था)और उसी भांति दक्षिणी महासागर में डुबकी लगाकर दिव्य चक्र पुनः बाहर निकला और पश्चिम प्रदेश की ओर आगे बढ़ा और फिर उत्तरी प्रदेश की ओर बढ़ा, और वहां भी वही सब बातें हुईं, जो दक्षिणी तथा पश्चिम प्रदेश में हुई थीं।
इसके बाद जब दिव्य चक्र संपूर्ण पृथ्वी पर, महासागर की सीमा तक विजय पताका फहराता हुआ घूम चुका, तो वह राजसी नगर में वापस आया और रुक गया, ताकि उसे चक्र-प्रवर्तक राजा के आंतरिक कमरों में प्रवेश द्वार पर न्याय कक्ष के सामने स्थित करने के संबंध में विचार किया जा सके, जिससे वह विश्व के अधिपति, प्रभुसत्ता संपन्न राजा के आंतरिक कमरों के सामने अपने गौरव के साथ चमकता रहे।
(8) और बंधुओ, एक दूसरा राजा भी चक्र प्रवर्तक हुआ, और तीसरा और चौथा राजा, और पांचवां तथा छठा, और सातवां राजा एक विजेता योद्धा बहुत सालों बाद, कई सौ सालों के बाद, हजारों सालों के बाद, किसी व्यक्ति को यह कहकर आदेश देता है कि ‘यदि आपको यह दिखाई पड़े कि दिव्य चक्र नीचे धंस गया है, अपने स्थान से खिसक गया है, तो मुझे आकर बताओ।’
‘बहुत अच्छा, महाराज।’ उस मनुष्य ने उत्तर दिया। इस प्रकार बहुत सालों के बाद, कई सौ सालों के बाद, हजारों सालों के बाद एक व्यक्ति ने देखा कि दिव्य