14. बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स - Page 365

350 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

चक्र धंस गया है, वह अपने स्थान से खिसक गया है। ऐसा देखकर वह वीर राजा के पास गया और उसको बताया। फिर उस राजा ने वैसा ही किया, जैसा कि स्त्रात्रय ने किया था। और राजा के संन्यासी हो जाने के सातवें दिन दिव्य चक्र लुप्त हो गया।

फिर कोई व्यक्ति राजा के पास गया और उससे जाकर कहा। वह राजा चक्र के लुप्त हो जाने पर दुःखी हुआ और शोक से पीडि़त हुआ। परंतु वह राजा प्रभुसत्ता संपन्न, अधिपति के श्रेष्ठ कर्तव्य के संबंध में पूछने के लिए संन्यासी राजा के पास नहीं गया, बल्कि अपने विचार से ही, निश्ांक होकर जनता पर अपना शासन चलाता रहा। लोगों पर उसका शासन पहले शासन से अलग प्रकार का था। प्रभुसत्ता संपन्न राजा के आर्य श्रेष्ठ कर्तव्य का पालन करने वाले, पूर्ववर्ती राजाओं के शासन में वे जिस प्रकार से समृद्धिशाली थे, उस प्रकार इस राजा के शासन में समृद्ध नहीं रहे।

फिर, बंधुओ, मंत्री तथा दरबारी, वित्त अधिकारी, रक्षक व पहरेदार, द्वारपाल तथा धार्मिक अनुष्ठान करने वाले, सभी व्यक्ति मिलकर राजा के पास आए और उससे इस प्रकार बोलेः-‘हे राजन, आप अपनी जनता पर शासन अपने विचारों के अनुसार करते हैं जो उस शासन-विधि से भिन्न है, जिस विधि से आपके पूर्ववर्ती राजा, आर्य (श्रेष्ठ) कर्तव्य का पालन करते हुए किया करते थे, अतः आपके इस शासन में आपकी जनता समृद्ध नहीं है। अब आपके राज्य में मंत्री तथा दरबारी, वित्त अधिकारी, रक्षा तथा अभिरक्षक एवं धार्मिक अनुष्ठान करने वाले हम दोनों तथा अन्य लोग हैं, जिन्हें प्रभुसत्ता-संपन्न राजा के आर्य (श्रेष्ठ)कर्तव्य का ज्ञान व जानकारी है। हे राजन, आप उसके संबंध में हमसे पूछिए। आपके पूछने पर हम उसे आपको बताएंगे।’

(9) इसके बाद, बंधुओ, उस राजा ने मंत्रियों तथा उन सभी शेष लोगों को एक साथ बिठाया, उनसे प्रभुसत्ता-संपन्न शूरवीर राजा के श्रेष्ठ कर्तव्य के संबंध में पूछा और उन्होंने उसे बताया। जब उसने उनकी बात सुन ली तो उसने उनको उचित सावधानी तथा निगरानी व अभिरक्षा प्रदान की, परंतु उसने दीनहीन व असहाय लोगों को धन प्रदान नहीं किया और चूंकि यह नहीं किया गया, इसलिए दरिद्रता व निर्धनता व्यापक रूप में फैल गई।

इस प्रकार जब निर्धनता भरपूर व प्रचुर मात्रा में फैल गई, तो किसी व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति की चीज उठा ली, जो उसे दूसरे व्यक्ति ने नहीं दी थी। उसे लोगों ने पकड़ लिया और राजा के सामने प्रस्तुत किया उन्होंने राजा से कहा, ‘हे महाराज,