14. बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स - Page 366

बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स

351

इस व्यक्ति ने वह चीज उठा ली है जो उसे नहीं दी गई थी और ऐसा करना चोरी है।’

इस बात को सुनकर राजा ने उस व्यक्ति से इस प्रकार कहाः ‘क्या यह सच है कि जो चीज तुम्हें किसी व्यक्ति ने नहीं दी, तुमने उसे उठाया है। क्या तुमने वह काम किया है, जिसे लोग चोरी करते हैं।’ ‘महराज, यह सच है।’ ‘लेकिन क्यों?’ महाराज, मेरे पास जीवन-यापन के लिए कुछ नहीं है’, तब राजा ने उस व्यक्ति को धन दिया और उससे कहा, ‘इस धन से तुम अपने’ आपको जीवित रखो। अपने माता-पिता अपने बच्चों तथा पत्नी का पालन-पोषण करो और अपना कारोबार व धंधा चलाओ।’ ‘महाराज, ऐसा ही होगा,’ उस मनुष्य ने उत्तर दिया।

(10)अब एक दूसरे व्यक्ति ने चोरी करके दूसरे व्यक्ति की वह चीज उठा ली, जो उसे नहीं दी गई थी। उसे लोगों ने पकड़ लिया और राजा के सामने लाए। उन्होंने राजा को बताया, ‘महाराज इस व्यक्ति को जो चीज नहीं दी गई थी, उसे इसने चोरी से उठा लिया है।’ और राजा ने वही बात कही एवं उसी प्रकार किया भी, जिस प्रकार उसने पहले व्यक्ति को कहा था और उसके लिए किया था।

(11) अब बंधुओ, लोगों ने सुना, कि जिन लोगों ने चोरी से उन वस्तुओं को उठाया जो उनको नहीं दी गई थीं, उन लोगों को राजा धन दे रहा है, और इस बात को सुनकर उन्होंने सोचा कि हम भी उन चीजों को चोरी से उठा लें, जो हमें नहीं दी गई हैं।

अब फिर किसी व्यक्ति ने वैसा किया। उसे उन्होंने पकड़कर राजा के समक्ष उस पर आरोप लगाया। राजा ने पहले की भांति उससे पूछा, ‘तुमने चोरी क्यों की?’ ‘क्योंकि महाराज, मैं अपना जीवन-यापन नहीं कर सकता।’

तब राजा ने सोचा कि यदि मैं हमेशा ऐसे किसी भी व्यक्ति को धन देता रहूंगा, जिसने चोरी से उस वस्तु को उठा लिया है जो उसे नहीं दी गई थी, तो चोरी में वृद्धि होगी। अब मुझे इसे अंतिम रूप से रोकना होगा और उसे समुचित दंड देना होगा, उसका सिर कटवा देना चाहिए।

अतः उसने अपने व्यक्तियों से कहा, ‘देखो इस आदमी की बाहों को इसकी कमर के पीछे एक मजबूत रस्सी से बांध दो, उसमें गांठ दे दो, इसके सिर का मुंडन करके गंजा बना दो, इसे सड़कों पर, चौराहों पर ढोल बजाते हुए घुमाओ, इसे दक्षिण द्वार से बाहर लेकर नगर के दक्षिण की ओर ले जाओ। इस कार्य पर अंतिम रोक लगा दो। इसे भारी दंड दो, इसका सिर काट दो’। उन लोगों ने उत्तर दिया, ‘महाराज (ऐसा ही हो),’ और उसके आदेश का पालन किया।