14. बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स - Page 367

352 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

(12) बंधुओ, अब लोगों ने सुना कि जो लोग दूसरों की चीज चोरी से उठाते हैं जो उनको नहीं दी गई, तो उन्हें मृत्यु-दंड दिया जाता है। इस बात को सुनकर उन्होंने सोचा, अब हमें भी तेजधार वाली तलवारें उनके लिए स्वयं तैयार करनी चाहिए जिनकी हम वस्तु उठाते हैं, जो हमें नहीं दी गईं- वे उसे जो कुछ कहें-हमें उनको रोकना होगा। उनको भारी दंड देना होगा और उनके सिर काटने होंगे।

अतः उन्होंने तेजधार वाली तलवारें तैयार करा लीं और वे ग्राम, कस्बों तथा नगर को लूटने तथा राजमार्ग पर लूटपाट करने के लिए निकल पड़े। जिन लोगों को लूटते थे, उनके सिर काट कर उनको मार डालते थे।

(13) इस प्रकार बंधुओ, दीन-हीनों को वस्तुएं व समान न दिए जाने से निर्धनता फैल गई, निर्धनता से हिंसा बढ़ी और फैली। हिंसा के बढ़ने से जीवन का विनाश सामान्य बात हो गई। हत्याओं की संख्या में वृद्धि होने से उन प्राणियों व व्यक्तियों के जीवन की अवधि भी सामान्यतया समाप्त हो गई।

अब बंधुओ, कुछ बुजुर्गों में से किसी ने दूसरे व्यक्ति की कोई चीज चुराकर उठा ली जो उसे नहीं दी गई थी, और उस पर भी अन्य लोगों के समान आरोप लगाया गया और उसे भी राजा के समक्ष लाया गया। राजा ने उससे पूछा कि ‘क्या यह सच है कि तुमने चोरी की है।’ उसने उत्तर दिया, ‘नहीं, हे राजन, वे जान-बूझकर झूठ बोल रहे हैं।’

(14) इस प्रकार दीन-हीनों व दरिद्रों को समान वस्तुएं न दिए जाने से निर्धनता फैली... चोरी...हिंसा...हत्या...सामान्य हो गई। फिर किसी व्यक्ति ने राजा से कहा, ‘हे राजन, अमुक व्यक्ति ने चोरी से वह वस्तु उठा ली है जो उसे नहीं दी गई थी, और इस प्रकार उसकी बुराई की।’

(15) और बंधुओ, इसलिए, दीन-हीनों, दरिद्रों को वस्तुएं व माल न दिए जाने से निर्धनता फैली, उसका विस्तार हुआ, चोरी, हिंसा, हत्या, झूठ, बुराई करना आदि जैसी बातें प्रचुर मात्रा मे बढ़ गईं।

(16) झूठ बोलने से जार कर्म में वृद्धि हुई।

(17) इस प्रकार दीन-हीनों, दरिद्रों को माल व वस्तुएं न दिए जाने के कारण निर्धनता... चोरी... हिंसा.... हत्या.... झूठ... चुगलखोरी... अनैतिकता फैली, उसका विस्तार हुआ।

(18) बंधुओ, उनके बीच तीन चीजों में वृद्धि हई। ये थीं, कोटुम्बिक व्यभिचार, अनियंत्रित लालच तथा विकृत लोभ।