354 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
राज्य की शिथिलता या समाप्ति
साम्यवादी स्वयं इस बात को स्वीकार करते हैं कि एक स्थाई तानाशाही के रूप में राज्य का उनका सिद्धांत उनके राजनीतिक दर्शन की कमजोरी है। वे इस तर्क का आश्रय लेते हैं कि राज्य अंततः समाप्त हो जाएगा। दो ऐसे प्रश्न हैं, जिनका उन्हें उत्तर देना है। राज्य समाप्त कब होगा? जब वह समाप्त हो जाएगा, तो उसके स्थान पर कौन आएगा? प्रथम प्रश्न के उत्तर में कोई निश्चित समय नहीं बता सकते। लोकतंत्र को सुरक्षित रखने के लिए भी तानाशाही अल्पावधि के लिए अच्छी हो सकती है, और उसका स्वागत किया जा सकता है लेकिन तानाशाही अपना काम पूरा कर चुकने के बाद लोकतंत्र के मार्ग में आने वाली सब बाधाओं तथा शिलाओं को हटाने के बाद तो स्वयं समाप्त क्यों नहीं जो जाती? क्या अशोक ने इसका उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया था? उसने कलिंग के विरुद्ध हिंसा को अपनाया। परंतु उसके बाद उसने हिंसा का पूर्णतया परित्याग कर दिया। यदि आज हमारे विजेता केवल अपने विजितों को ही नहीं, बल्कि स्वयं को भी शस्त्र-विहीन कर लें, तो समस्त संसार मे शांति हो जाएगी।
साम्यवादियों ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया है। जब राज्य समाप्त हो जाएगा तो उसके स्थान पर क्या आएगा, इस प्रश्न का किसी भी प्रकार कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया, यद्यपि यह प्रश्न कि राज्य कब समाप्त होगा, कि अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण हे। क्या इसके बाद अराजकता आएगी? यदि ऐसा होगा तो साम्यवादी राज्य का निर्माण एक निरर्थक प्रयास है। यदि इसे बल-प्रयोग के अलावा बनाए नहीं रखा जा सकता, और जब उसे एक साथ बनाए रखने के लिए बल-प्रयोग नहीं किया जाता और यदि इसका परिणाम अराजकता है, जो फिर साम्यवादी राज्य से क्या लाभ हैं।
बल-प्रयोग को हटाने के बाद जो चीज इसे कायम रख सकती है, वह केवल धर्म ही है। परंतु साम्यवादियों की दृष्टि में धर्म अभिशाप है। धर्म के प्रति उनमें घृणा इतनी गहरी बैठी है कि वे साम्यवादियों के लिए सहायक धर्मों तथा जो उनके लिए सहायक नहीं हैं, उन धर्मों के बीच भी भेद नहीं करेंगे। साम्यवादी ईसाई मत के प्रति अपनी घृणा को बौद्ध धर्म तक ले गए हैं। उन्होंने इन दोनों के बीच अंतर की जांच करने का भी कष्ट नहीं किया। साम्यवादियों ने ईसाई मत के विरुद्ध दुहरे आरोप लगाए हैं। ईसाई मत के विरुद्ध उनका प्रथम आरोप यह था कि वह लोगों को परलोक के प्रति सजग तथा इस लोक में दरिद्रता भोगने के लिए बाध्य करता है। जैसा कि बौद्ध धर्म की उक्तियों से देखा जा सकता है, ऐसा आरोप बौद्ध धर्म के विरुद्ध नहीं लगाया जा सकता।
ईसाई धर्म के विरुद्ध साम्यवादियों द्वारा दूसरा जो आरोप लगाया जाता है, उसे बौद्ध धर्म के विरुद्ध नहीं लगाया जा सकता। इस आरोप को संक्षेप में इस प्रकार कहा जाता