बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स
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है कि धर्म जनता के लिए अफीम है। यह आरोप ईसा के पर्वत प्रवचन (सरमन आन दि माउंट)पार आधारित है, जो बाईबिल में मिलता है। यह निर्धन, दरिद्र तथा दुर्बल के लिए स्वर्ग के द्वार खोलता है। बुद्ध के उपदेश में पर्वत प्रवचन नहीं मिलता। उनकी शिक्षा व उपदेश धन व संपत्ति अर्जित करने से संबंधित है। मैं नीचे उनके द्वारा इस विषय में उनके एक शिष्य अनाथपिंडक को दिए गए प्रवचन का उल्लेख कर रहा हूं।
एक बार अनाथपिंडक उस स्थान पर आया, जहां पर बुद्ध ठहरे हुए थे। वहां आकर उसने उनको प्रणाम किया और एक ओर आसन ग्रहण किया और उनसे पूछा, ‘क्या भगवन, यह बताएंगे कि गृहस्थ के लिए कौन-सी बातें स्वागत योग्य, सुखद तथा स्वीकार्य हैं, परंतु जिन्हें प्राप्त करना कठिन है।’
बुद्ध ने इस प्रश्न को सुनकर कहाः
इनमें प्रथम विधिपूर्वक धन अर्जित करना है। दूसरी बात यह देखना है कि
आपके संबंधी भी विधिपूर्वक ही धन-संपत्ति अर्जित करें। तीसरी बात है, दीर्घकाल
तक जीवित रहो और लंबी आयु प्राप्त करो।
गृहस्थ को इन चार चीजों की प्राप्ति करनी है जो कि संसार में स्वागत योग्य,
सुखकारक तथा स्वीकार्य हैं, परंतु जिन्हें प्राप्त करना कठिन है, चार अवस्थाएं भी
हैं जो इनसे पूर्ववर्ती हैं। वे हैं, श्रद्धा, शुद्ध आचरण, स्वतंत्रता और बुद्धि।
शुद्ध आचरण दूसरे का जीवन लेने, अर्थात् हत्या करने, चोरी करने, व्यभिचार
करने, झूठ बोलने तथा मद्यपान करने से रोकता है।
स्वतंत्रता ऐसे ग्रहस्थ का गुण होती है, जो धनलोलुपता के दोष से मुक्त, उदार,
दानशील, मुक्तहस्त, दान देकर आनंदित होने वाला, और इतना शुद्ध हृदय का हो
कि उसे उपहारों का वितरण करने के लिए कहा जा सके।
बुद्धिमान कौन है?
वह जो यह जानता है कि जिस गृहस्थ के मन में लालच, धन लोलुपता, द्वेष,
आलस्य, उनींदापन, निद्रालुता, अन्यमनस्कता तथा संशय है और जो कार्य करना
चाहिए, उसकी उपेक्षा करता है, और ऐसा करने वाला प्रसन्नता तथा सम्मान से
वंचित रहता है।
लालच, कृपणता, द्वेष, आलस्य तथा अन्यमनस्कता तथा संशय मन के कलंक हैं।
जो गृहस्थ मन के इन कलंकों से छुटकारा पा लेता है, वह महान बुद्धि, प्रचुर बुद्धि
एवं विवेक, स्पष्ट दृष्टि तथा पूर्ण बुद्धि व विवेक प्राप्त कर लेता है।
अतएव, न्यायपूर्ण ढंग से तथा वैध रूप से धन प्राप्त करना, भारी परिश्रम से कमाना,