14. बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स - Page 371

356 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

भुजाओं की शक्ति व बल से धन संचित करना, तथा भौहों का पसीना बहाकर परिश्रम से प्राप्त करना, एक महान वरदान हैं। ऐसा गृहस्थ स्वयं को प्रसन्न तथा आनंदित करता है और हमेशा प्रसन्नता व हर्ष से परिपूर्ण रहता है तथा अपने माता-पिता, पत्नी तथा बच्चों, मालिकों और श्रमिकों, मित्रों तथा सहयोगियों, साथियों को भी प्रसन्नता तथा प्रफुल्लता से परिपूर्ण रखता है।

रूसी विचारक ऐसी स्थिति में, जब बल नहीं रहता, साम्यवाद को बनाए रखने के लिए अंतिम सहायता के रूप में बौद्ध धर्म की ओर ध्यान देते नहीं प्रतीत होते।

रूसी विचारक अपने साम्यवाद पर गर्व करते हैं, परंतु से यह भूल जाते हैं कि सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि बुद्ध ने, जहां तक संघ का संबंध है, उसमें तानाशाही-विहीन साम्यवाद की स्थापना की थी। यह हो सकता है कि वह साम्यवाद बहुत छोटे पैमाने पर था, परंतु वह तानाशाही-विहीन साम्यवाद था, वह एक चमत्कार था जिसे करने में लेनिन असफल रहा।

बुद्ध का तरीका अलग था। उनका तरीका मनुष्य के मन को परिवर्तित करना, उसकी प्रवृत्ति व स्वभाव को परिवर्तित करना था, ताकि मनुष्य जो भी करे, वह उसे स्वेच्छा से बल-प्रयोग या बाध्यता के बिना करे। मनुष्य की चित्तवृत्ति व स्वभाव को परिवर्तित करने का उनका मुख्य साधन उनका धम्म (धर्म) था तथा धम्म के विषय में उनके सतत उपदेश थे। बुद्ध का तरीका लोगों को उस कार्य को करने के लिए वे जिसे पसंद नहीं करते थे, बाध्य करना नहीं था, चाहे वह उनके लिए अच्छा ही हो। उनकी पद्धति मनुष्यों की चित्तवृत्ति व स्वभाव को बदलने की थी, ताकि वे उस कार्य को स्वेच्छा से करें, जिसको वे अन्यथा न करते ।

यह दावा किया गया है कि रूस में साम्यवादी तानाशाही के कारण आश्चर्यजनक उपलब्धियां हुई हैं। इससे इंकार नहीं किया जा सकता। इसी कारण मैं यह कहता हूं कि रूसी तानाशाही सभी पिछड़े देशों के लिए अच्छी व हितकर होगी। परंतु स्थाई तानाशाही के लिए यह कोई तर्क नहीं है। मानवता के लिए केवल आर्थिक मूल्यों की ही आवश्यकता नहीं होती, उसके लिए आध्यात्मिक मूल्यों को बनाए रखने की आवश्यकता भी होती है। स्थाई तानाशाही ने आध्यात्मिक मूल्योंकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया और वह उनकी ओर ध्यान देने की इच्छुक भी नहीं है। कार्लाइल ने राजनीतिक अर्थशास्त्र को ‘सुअर दर्शन’ की संज्ञा दी है। कार्लाइल का कहना वास्तव में गलत है, क्योंकि मनुष्य की भौतिक सुखों के लिए तो इच्छा होती ही है परंतु साम्यवादी दर्शन समान रूप से गलत प्रतीत होता है क्योंकि उनके दर्शन का उद्देश्य सुअरों को मोटा बनाना प्रतीत होता है, मानों मनुष्य सुअरों जैसे हैं। मनुष्य का विकास भौतिक रूप के साथ-साथ आध्यात्मिक रूप से