बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स
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भी होना चाहिए। समाज का लक्ष्य एक नवीन नींव डालने का रहा है, जिसे फ्रांसीसी क्रांति द्वारा संक्षेप में तीन शब्दों में - भ्रातृत्व, स्वतंत्रता तथा समानता - कहा गया है। इस नारे के कारण ही फ्रांसीसी क्रांति का स्वागत किया गया था। वह समानता उत्पन्न करने में असफल रही। हम रूसी क्रांति का स्वागत करते हैं, क्योंकि इसका लक्ष्य समानता उत्पन्न करना है, परंतु इस बात पर अधिक जोर नहीं दिया जा सकता कि समानता लाने के लिए समाज में भ्रातृत्व या स्वतंत्रता का बलिदान किया जा सकता। भ्रातृत्व या स्वतंत्रता के बिना समानता का कोई मूल्य व महत्व नहीं। ऐसा प्रतीत होता है कि ये तीनों तभी विद्यमान रह सकती हैं, जब व्यक्ति बुद्ध के मार्ग का अनुसरण करे। साम्यवादी एक ही चीज दे सकते हैं, सब नहीं।