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सुधारक और उनकी नियति

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में जो बहुपति-प्रथा पाई जाती थी, उसमें एक ही परिवार के कई लोग एक ही औरत से सहवास करते थे। धहाप्रचेतनी और उसके पुत्र सोम ने मरीशा (सोम की पुत्री) से सहवास किया। ख्1,

दादा द्वारा अपनी पौत्री से विवाह रचाने के उदाहरण कम नहीं हैं। दक्ष ने अपनी पुत्री अपने पिता ब्रह्मा ख्2, के साथ ब्याह रचाने के लिए दे दी थी और इस ब्याह से प्रसिद्ध नारद का जन्म हुआ था। दौहित्र ने अपनी 27 पुत्रियों को अपने पिता सोम को सहवास और प्रजनन के लिए दे दिया था। ख्3,

आर्यों को औरत के साथ खुले आम लोगों की आंखों के सामने सहवास करने में कोई आपत्ति नहीं थी। ऋषिगण एक धार्मिक अनुष्ठान किया करते थे, जिसे वामदेव्या व्रत कहते थे। यह अनुष्ठान यज्ञ-भूमि पर किया जाता था। यदि कोई औरत वहां आकर सहवास की इच्छा व्यक्त करती थी और ऋषि से अपनी संतुष्टि के लिए कहती थी, तो ऋषि उसी समय वहीं खुले में यज्ञ-भूमि पर उसके साथ सहवास किया करते थे। इसके कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। ऋषि पराशर को ही लीजिए। उन्होंने सत्यवती के साथ इसी प्रकार सहवास किया था। ऋषि दीर्घतप ने भी ऐसा किया था। ‘अयोनि’ शब्द के अस्तित्व से पता चलता है कि यह रिवाज एक सामान्य बात थी। ‘अयोनि’ शब्द का अर्थ निष्पाप गर्भधारण समझा जाता है। लेकिन इस शब्द का मूल अर्थ यह नहीं है। ‘योनि’ शब्द का मूल अर्थ ‘घर’ होता है। ‘अयोनि’ शब्द का अर्थ घर से बाहर, अर्थात

खुले स्थान पर गर्भधारण करना होता है। सीता और द्रौपदी, दोनों अयोनिजा थीं। इस तथ्य से पता चलता है कि इसे गलत नहीं माना जाता था। इस प्रथा को रोकने के लिए धार्मिक निषेधादेश जारी करना पड़ा था। ख्4, इससे भी स्पष्ट है कि यह एक सामान्य बात थी।

आर्यों में अपनी स्त्रियों को कुछ अवधि के लिए भाड़े पर देने की प्रथा भी थी। उदाहरण के लिए, माधवी ख्5, की कहानी का उल्लेख किया जा सकता है। राजा ययाति ने अपने गुरु गालव को अपनी पुत्री माधवी भेंट स्वरूप में दे दी थी। गालव ने माधवी को तीन राजाओं को अलग-अलग अवधि के लिए भाड़े पर दे दिया था। उसके बाद उसने उसे विवाह रचाने के लिए विश्वामित्र को दे दिया। पुत्र उत्पन्न होने तक वह उनके साथ रही। उसके बाद गालव ने लड़की को पुनः उसके पिता ययाति को लौटा दिया।

अस्थाई तौर पर स्त्रियों को दूसरों को भाड़े पर देने की प्रथा के अलावा आर्यों में एक अन्य प्रथा प्रचलित थी, उनमें से सर्वोत्तम पुरुषों को संतानोत्पत्ति की अनुमति देना।

  1. हरिवंश, अध्याय 2

  2. वही, अध्याय 3

  3. हरिवंश, अध्याय 3

  4. महाभारत, आदि पर्व, अध्याय 193

  5. वही, उद्योग पर्व, अध्याय 106-23