सुधारक और उनकी नियति
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आर्यों के धर्म में यज्ञ या बलि का समावेश है। यज्ञ देवताओं के देवत्य में प्रवेश और उन्हें काबू में करने का माध्यम भी था। पारंपरिक यज्ञों की संख्या इक्कीस थी, जिन्हें सात-सात के तीन वर्गों में विभक्त किया गया था। पहले वर्ग के यज्ञों में मक्खन, दूध, अनाज आदि की आहुतियां दी जाती थीं। दूसरे वर्ग में सोम की आहुति और तीसरे में जीव की बलि चढ़ाई जाती थी। यज्ञ अल्पावधि अथवा एक वर्ष या उससे अधिक समय तक चलने वाले दीर्घकालिक हो सकते थे। दीर्घकालिक को सत्र कहा जाता था। यज्ञ के पक्ष में तर्क यह है कि इसे करने वाला शाश्वत पुण्य का भागी बनता है। यज्ञ के माध्यम से स्वयं उस मनुष्य का ही नहीं, अपितु उसके पितरों का भी उद्धार हो जाता है। अपनी भेंट द्वारा वह पितरों को सुख तो प्रदान करता ही है, साथ ही उनका वैभव बढ़ाता है और उन्हें स्वर्गलोक में रहने के लिए भेजता है। ख्1,
यज्ञ का प्रयोजन मात्र स्वर्गीय आनंद के प्राप्ति में सहायक बनना कदापि नहीं था। अधिकतर बड़े यज्ञ पृथ्वी पर उत्तम वस्तुओं की प्राप्ति के लिए किए जाते थे। भविष्य के किसी लाभ के बिना किसी ने यज्ञ किया हो, इसकी जानकारी नहीं मिलती। ब्राह्मण-प्रधान भारत आभार प्रकट करना नहीं जानता था। सामान्य रूप से किसी व्यक्ति को यह लाभ उस देवता से मुआवजे के रूप में प्राप्त उपहार होता, जिसको आहुति दी जाती। यज्ञ का प्रारंभ इन शब्दों के उच्चारण के साथ होता हैः ‘वह इस मंत्र पाठ के साथ देवता को आहुति देता हैः ‘तू मुझे दे और मैं तुझे दूंगा_ तू मुझे अर्पित कर और मैं तुझे अर्पित करूंगा।’
यज्ञ का अनुष्ठान विस्मय जागृत करता था। हर शब्द परिणाम-गर्भित होता था, यहां तक कि शब्द का उच्चारण अथवा लहजा भी महत्वपूर्ण होता था। तथापि ऐसे संकेत मिलते हैं कि स्वयं पुरोहित भी यह समझते थे कि अधिकांश अनुष्ठान छलावा मात्र हैं और उनका उतना महत्व नहीं है, जितना कि बताया गया है।
प्रत्येक यज्ञ का अर्थ होता था, पुरोहित को दक्षिणा देना। जहां तक दक्षिणा का संबंध है, उसके नियम स्पष्ट थे और उनके प्रतिपादक निर्लज्ज थे। पुरोहित मात्र दक्षिणा के लिए यज्ञ कराता था और उसमें मूल्यवान वस्त्र, गाय, घोड़े अथवा स्वर्ण होता था। कब क्या दिया जाना है, इसका बड़ी सावधानी से उल्लेख किया गया था। पुरोहितों ने कर्मकांड का एक ऐसा जाल बिछाया था कि हर अनुष्ठान पर वे दक्षिणा की मांग करते थे। संपूर्ण व्यय का भार, जो बहुत ही विपुल होता था, उस एक व्यक्ति पर पड़ता था, जिसके लाभ के लिए यज्ञ कराया जाता था। संपूर्ण अनुष्ठान कितना व्ययसाध्य होता था, इसे इस बात से देखा जा सकता है कि एक जगह पर यज्ञ के लिए दी जाने वाली दक्षिणा एक हजार गायों के रूप में बताई गई है। इतने बड़े लोभ के लिए वह यह घोषणा करता था कि जो एक हजार गायों का दान करता है, उसे स्वर्ग की सभी वस्तुएं प्राप्त हो
- यह होपकिन्स की पुस्तक दि रिलीजन ऑफ इंडिया से लिया गया है।