4. सुधारक और उनकी नियति - Page 43

28 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जाती हैं। पुरोहित के पास प्रस्तुत करने के लिए अच्छा पूर्वोदाहरण यह था कि स्वर्ग के देवताओं के बारे में प्रचलित कथाओं में कहा गया है कि वे जब पड़ोसी देवताओं की मदद करते हैं, तो सदैव एक-दूसरे से पुरस्कार की मांग करते हैं। जब देवता पुरस्कार चाहते हैं, तो पुरोहित को भी वैसा करने का अधिकार है।

जीव की बलि चढ़ाये जाने वाला यज्ञ प्रमुख यज्ञ होता था। यह खर्चीला और नृशंस होता था। आर्यों के धर्म में बलि के लिए पांच जीवों का वर्णन है। बलि के लिए जीवों की इस सूची में पहला स्थान मनुष्य का था। नर-बलि सबसे महंगी होती थी। इस बलि के नियमों के अनुसार यह आवश्यक था कि वध किया जाने वाला व्यक्ति न तो पुरोहित हो और न ही दास हो। उसे क्षत्रिय अथवा वैश्य होना चाहिए। उस समय के सामान्य मूल्यांकन के अनुसार बलि के लिए खरीदे जाने वाले मनुष्य का मूल्य एक हजार गायें था। खर्चीला और नृशंस होने के अलावा यह अत्यंत वीभत्स होता होगा, क्योंकि बलि चढ़ाने वालों को केवल मनुष्य का वध ही नहीं करना होता था, बल्कि उसे खाना भी पड़ता था। मनुष्य के बाद दूसरा स्थान घोड़े का था। वह भी काफी खर्चीली बलि होती थी, क्योंकि घोड़ा आर्यों के लिए उनकी भारत विजय में एक दुर्लभ और आवश्यक पशु था। सैन्य शासन के इतने सक्षम साधन को बलि की भेंट चढ़ाना आर्यों के लिए रुचिकर नहीं था। यह बलि इसलिए भी वीभत्स होती होगी, क्योंकि अश्व-बलि चढ़ाने के एक अनुष्ठान में वध किए जाने से पूर्व घोड़े की बलि चढ़ाने वाले की पत्नी के साथ मैथुन कराया जाता था।

आमतौर पर बलि के लिए भेंट किए जाने वाले ऐसे पशु होते थे, जिनका उपयोग लोग अपने कृषि-प्रयोजनों के लिए किया करते थे। उनमें अधिकतर गाय और बैल होते थे।

यज्ञ खर्चीले होते थे और उन पर होने वाले व्यय के विचार से यह प्रथा समाप्त हो सकती थी। लेकिन वह समाप्त नहीं हुई। कारण यह है कि यज्ञ के रुकने से ब्राह्मण को होने वाली दक्षिणा की हानि का प्रश्न इससे जुड़ा हुआ है। यदि यज्ञ कराना रुक जाता तो कोई दक्षिणा भी नहीं रह पाती और ब्राह्मण भूखों मर जाता। इसलिए ब्राह्मण ने खर्चीली जीव-बलि का विकल्प खोज लिया। नर-बलि के लिए ब्राह्मण ने जीवित मनुष्य के स्थान पर घास-फूस अथवा धातु अथवा मिट्टी के बने मनुष्य को प्रस्तुत करने की अनुमति दे दी। लेकिन उन्होंने इस भय से नर-बलि का पूर्णरूप से त्याग नहीं किया कि कहीं यज्ञों का कराना बंद हो गया तो उन्हें अपनी दक्षिणा से हाथ धोना पड़ेगा। जब नर-बलि बहुत कम हो गई तो उसके विकल्प के रूप में पशु-बलि शुरू हो गई। आम लोगों के लिए पशु-बलि भी खर्चीली थी। यहां भी इस आशंका से कि कहीं इस बलि का प्रचलन ही बंद न हो जाए, ब्राह्मण बड़े पशु के स्थान पर छोटे पशु का सुझाव लेकर आगे आया, जैसे कि पहले मनुष्य और घोड़े के स्थान पर पशु-बलि की अनुमति दी गई थी। यह सब यज्ञ को जारी रखने के