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सुधारक और उनकी नियति

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प्रयोजन के लिए किया गया, ताकि ब्राह्मण को दक्षिणा का नुकसान न उठाना पड़े, जोकि उसकी आजीविका थी। ब्राह्मण यज्ञ को जारी रखने के लिए इतने कटिबद्ध थे कि वे भेंट-स्वरूप मात्र चावल प्राप्त करके संतुष्ट हो जाते थे।

तथापि इससे यह नहीं माना जाना चाहिए कि प्रस्तुत विकल्प से आर्यों के यज्ञों की भयावहता में कमी आ गई थी। विकल्पों को अपनाने के बावजूद अधिक खर्चीली और नृशंस बलि का स्थान अपेक्षाकृत कम खर्चीली और निर्दोष बलि ने पूर्ण रूप से नहीं लिया। इससे यही निष्कर्ष निकला कि भेंट बलि कराने वाले की क्षमता के अनुसार हो सकती है। अगर यह गरीब हो तो भेंट चावल की हो सकती है। अगर वह संपन्न हो तो भेंट बकरी की हो सकती है। अगर वह अमीर हो तो भेंट मनुष्य, गाय, घोड़े अथवा सांड की हो सकती है। विकल्पों का प्रभाव यह हुआ कि यज्ञ को सभी की सामर्थ्य के भीतर लाया गया, ताकि कुल-मिलाकर ब्राह्मण अपेक्षाकृत अधिक लाभ अर्जित कर सके। इसके प्रभाव से पशु-बलि नहीं रुक सकी। वास्तव में असंख्य लोगों द्वारा पशु-बलि जारी रखी गई।

यज्ञ में बहुधा नियमित रूप से पशुओं की हत्या होती थी, जिसमें ब्राह्मण बधिकों का काम करते थे। किस सीमा तक इन निर्दोष पशुओं की हत्या होती थी, इसकी कुछ जानकारी बौद्ध साहित्य में निहित यज्ञों के उल्लेख से प्राप्त होती है। सुत्तनिपात में एक ऐसे यज्ञ का वर्णन किया गया है, जिसे कौशल-नरेश प्रसेनजित द्वारा संपन्न किए जाने की व्यवस्था की गई थी। यह बताया जाता है कि यज्ञ में वध के लिए खंभों से पांच सौ बैल, पांच सौ सांड, पांच सौ गाएं, पांच सौ बकरियां और पांच सौ मेंमने बांधे गए थे और यज्ञ करने वाले पुरोहितों के आदेशानुसार राजा के सेवकों को जो कार्य सौंपे गए थे, वे अपने कर्त्तव्यों का पालन आश्रुपूरित नेत्रों से कर रहे थे।

यज्ञ में जहां एक ओर भयंकर हत्या-कांड होता था, वहां वह वास्तव में एक प्रकार का उत्सव बन जाता था। भुने हुए मांस के अलावा, मादक पेय भी सुलभ होते थे। ब्राह्मणों के लिए सोम और सुरा, दोनों ही उपलब्ध होती थीं। अन्य लोगों को काफी मात्रा में सुरा सुलभ होती थी। लगभग प्रत्येक यज्ञ के बाद जुआ खेला जाता था और सबसे असाधारण बात यह है कि इसके साथ-साथ खुले में संभोग भी चलता रहता था। यज्ञ अय्याशीपूर्ण बन गए थे और उनमें कोई धर्म शेष नहीं रह गया था।

आर्य धर्म अनुष्ठानों की शृंखला मात्र था। इन अनुष्ठानों के पीछे अच्छे और सदाचारी जीवन के लिए कोई ललक नहीं होती थी। पवित्रता के लिए कोई कामना या पिपासा नहीं थी। उनके धर्म में कोई आध्यात्मिक तत्व नहीं था। ऋग्वेद के देवगीत आर्य धर्म में आध्यात्मिक आधार की अनुपस्थिति का बहुत ही अच्छा प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। देवगीत आर्यों द्वारा अपने देवताओं के लिए की गई प्रार्थनाएं हैं। इन प्रार्थनाओं में वे क्या कामना करते हैं? क्या वे यह प्रार्थना करते हैं कि उन्हें लोभ से दूर रखा जाए? क्या वे बुराई से