4. सुधारक और उनकी नियति - Page 45

30 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

छुटकारा पाने की प्रार्थना करते हैं? क्या वे अपने पापों के लिए क्षमादान की प्रार्थना करते हैं? अधिसंख्य देवगीतों में इंद्र की स्तुति की गई है। वे उसकी स्तुति इसलिए करते हैं, क्योंकि उसने आर्यों के शत्रुओं का विनाश किया। वे सभी गुणगान करते हैं, क्योंकि उसने कृष्ण नामक एक असुर की सभी गर्भवती पत्नियों को मार डाला। वे उसकी प्रशंसा करते हैं, क्योंकि उसने असुरों के सैकड़ों गांवों को नष्ट कर दिया। वे उसकी सराहना करते हैं, क्योंकि उसने लाखों दस्युओं को मार डाला। वे इस आशा में इंद्र की प्रार्थना करते हैं, ताकि वह अनार्यों का और भी विनाश कर सके, जिससे वे अनार्यों की खाद्य-आपूर्ति के साधन और संपदा प्राप्त कर सकें। ऋग्वेद के देवगीत आध्यात्मिक तथा उन्नायक होने की बजाय, कुत्सित विचारों तथा कुत्सित प्रयोजनों से परिपूर्ण है। आर्य धर्म का सरोकार कभी भी ऐसे जीवन से नहीं रहा, जिसे सदाचारी जीवन कहा जाता है।

II

बुद्ध के अवतरित होने के समय आर्यों के समाज की ऐसी ही स्थिति थी। सुधारक के रूप में आर्यों के समाज को सुधारने के लिए श्रम करने वाले बुद्ध के संबंध में दो संगत प्रश्न हैं। उनके सुधार में मुख्य आधार-स्तंभ क्या थे? अपने सुधार-आंदोलन में वह किस हद तक सफल हुए हैं?

पहले प्रश्न को लें। बुद्ध ने यह अनुभव किया कि अच्छे और विशुद्ध जीवन का बोध कराने के लिए आदेश की अपेक्षा उदाहरण बेहतर है। एक अच्छा और विशुद्ध जीवन बिताकर उन्होंने सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य किया, जिससे कि वह सभी के लिए एक आदर्श प्रस्तुत कर सके। उन्होंने कितना निष्कलंक जीवनयापन किया, इसका परिचय हमें ब्रह्म जाल सुत्त से प्राप्त हो सकता है। इसे नीचे उद्धृत किया जा रहा है, क्योंकि इसमें हमें केवल यही जानकारी नहीं मिलती कि बुद्ध ने कितना विशुद्ध जीवनयापन किया, अपितु यह हमें इस बारे में भी जानकारी देता है कि आर्यों में सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण कितना अस्वच्छ जीवनयापन करते थे।

ब्रह्म जाल सुत्त

  1. ऐसा मैंने सुना है। एक बार महाभाग लगभग पांच सौ बांधवों के साथ राजगृह और नालंदा के बीच मुख्य पथ से होकर गुजर रहे थे। और भिक्षु सुप्पिया भी अपने युवा शिष्य ब्रह्मदत्त के साथ राजगृह और नालंदा के बीच मुख्य पथ से होकर गुजर रहे थे। भिक्षु सुप्पिया, बुद्ध और उनके सिद्धांत एवं संघ की निंदा करते चले जा रहे थे। लेकिन उनके युवा शिष्य ब्रह्मदत्त बुद्ध की प्रशंसा में, सिद्धांत की प्रशंसा में, संघ की प्रशंसा में कई प्रकार से विचार व्यक्त कर रहा था। इस प्रकार परस्पर विरोधी मत रखने वाले गुरु और शिष्य, दोनों महाभाग और उनके साथी बांधवों के पीछे-पीछे चल रहे थे।

  2. अब महाभाग अपने साथी बांधवों के साथ रात गुजारने के लिए अम्बलत्तिका