सुधारक और उनकी नियति
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विहारोद्यान के राजकीय विश्रामगृह में रुके। भिक्षु सुप्पिया और उनके साथ उनके युवा शिष्य ब्रह्मदत्त भी वहीं ठहरे और विश्रामगृह में भी वे दोनों उसी विषय पर चर्चा करते रहे।
और तड़के बहुत से बांधव जागकर मंडप में एकत्र हुए और आसन ग्रहण करने के पश्चात बातें करने लगे। उनकी वार्ता का रुख इस प्रकार था, ‘बंधुओं, यह कितनी आश्चर्यजनक बात है और विचित्र भी कि महाभाग, अर्हत, महान् बुद्ध जो सब-कुछ जानते और देखते हैं, उन्होंने स्पष्ट रूप से यह समझ लिया होगा कि मनुष्यों की प्रवृत्तियां कितनी भिन्न होती हैं। क्योंकि देखने की बात यह है कि जबकि भिक्षु सुप्पिया बुद्ध, सिद्धांत और संघ की निंदा करते हैं, उनका ही युवा शिष्य ब्रह्मदत्त कई प्रकार से उनकी प्रशंसा में बोलता है। इस प्रकार गुरु और शिष्य, दोनों परस्पर विरोधी विचारों को व्यक्त करते हुए महाभाग और उनके बांधवों के पीछे-पीछे चलते हैं।
अब उनकी वार्ता के रुख को समझते हुए महाभाग मंडप में गए और उन्होंने उस आसन पर स्थान ग्रहण किया, जो उनके लिए बिछाया गया था। बैठने के बाद उन्होंने कहा, ‘आप यहां बैठे क्या बातें कर रहे हैं, और आपके बीच बातचीत का क्या विषय है?’ और उन्होंने उन्हें सब-कुछ बता दिया। और उन्होंने कहाः
‘बधुओ, अगर बाहर के लोग मेरे विरुद्ध अथवा संघ के विरुद्ध अथवा सिद्धांत के विरुद्ध बोलते हैं, तो आपको उस आधार पर न तो विद्वेष रखना चाहिए, न ईर्ष्या से पीडि़त होना चाहिए और न दुर्भावना-ग्रस्त होना चाहिए। अगर आप उस आधार पर क्रोध करेंगे अथवा आहत होंगे, तो उससे आपकी अपनी आत्म-विजय में बाधा पहुंचेगी। अगर, दूसरों के हमारे विरुद्ध बोलने पर आप क्रोध करेंगे और दुखी होंगे, तो क्या ऐसी स्थिति में आप यह निर्णय कर सकेंगे कि उनके भाषण में कौन-सी अच्छी या बुरी बात कही गई थी?’
‘श्रीमान्, यह नहीं होगा।’
‘लेकिन जब बाहर वाले मेरे अथवा सिद्धांत अथवा संघ के विरुद्ध बोलते हैं, तो आपको यह कहकर झूठ का उद्घाटन करना चाहिए और बताना चाहिए कि यह मिथ्या है, क्योंकि इस या उस कारण से यह तथ्य नहीं है, यह ऐसा नहीं है। ऐसी चीज हमारे बीच नहीं होती, न हममें होती है।’
- ‘लेकिन बंधुओं, अगर बाहर वाले मेरी, सिद्धांत की ओर संघ की सराहना में बोलते हैं, तो उस आधार पर आपको आनंदित अथवा हर्षित अथवा गर्वित नहीं होना चाहिए। यदि आप ऐसा करेंगे, तो इससे भी आपकी आत्म-विजय में बाधा पहुंचेगी। जब बाहर वाले मेरी अथवा सिद्धांत की अथवा संघ की सराहना करते हैं, तो आपको जो तथ्य है, उसे यह कहकर स्वीकार करना चाहिएः इस अथवा उस कारण से यह तथ्य है। यह ऐसा ही है। ऐसी चीज हमारे बीच पाई जाती है, हममें विद्यमान है।’