4. सुधारक और उनकी नियति - Page 48

सुधारक और उनकी नियति

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  1. अथवा वह कह सकता हैः ‘परिव्राजक गौतम बीजों अथवा पौधों को नुकसान नहीं पहुंचाते।’

‘वह दिन में केवल एक बार भोजन करते हैं, रात्रि को भोजन नहीं करते, दोपहर के बाद भोजन ग्रहण नहीं करते।

वह नाच, गानों और संगीत से भरपूर खेल-तमाशों और मेलों को देखने नहीं जाते।

वह पुष्पहार पहनने, इत्र तथा अनुलेपन से स्वयं को सुसज्जित करने से दूर रखते हैं।

वह विशाल एवं भव्य शय्या के उपयोग का परिवर्जन करते हैं।

वह चांदी अथवा स्वर्ण ग्रहण करने से दूर रहते हैं।

वह बिना पकाए हुए अन्न को ग्रहण करने से दूर रहते हैं।

वह कच्चा मांस ग्रहण करने से दूर रहते हैं।

वह स्त्रियों अथवा लड़कियों को स्वीकारने से दूर रहते हैं।

वह बंधुआ पुरुषों और बंधुआ स्त्रियों को स्वीकारने से दूर रहते हैं।

वह भेड़ों अथवा बकरियों को लेने से दूर रहते हैं।

वह कुक्कुटों और शूकरों को लेने से दूर रहते हैं।

वह हाथियों, पशुओं, घोड़ों और घोडि़यों को लेने से दूर रहते हैं।

वह जुते हुए खेतों अथवा बंजर भूमि को लेने से दूर रहते हैं।

वह बिचौलिए अथवा संदेशवाहक के रूप में कार्य करने से दूर रहते हैं।

वह क्रय-विक्रय से दूर रहते हैं।

वह तुलाओं, कांस्य तथा मापकों के जरिए धोखा देने से दूर रहते हैं।

वह उत्कोच, ठगी और धोखाधड़ी के कुटिल तरीके से दूर रहते हैं।

वह विकलांग बनाने, हत्या करने, दास बनाने, मुख्य पथों पर लूट, डकैती और हिंसा से दूर रहते हैं।’

बंधुआ, इसी प्रकार की बातें गैर-धर्मांतरित व्यक्ति तथागत की सराहना करते हुए कह सकता है।

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कुलशील (आचरण के बारे में छोटा पैरा) यहां पर समाप्त होता है।

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  1. अथवा वह कह सकता हैः ‘जब कि निष्ठावान व्यक्तियों द्वारा दिए जाने वाले भोजन पर निर्वाह करने वाले कुछ परिव्राजक और ब्राह्मण ऐसे नवपादपों और बढ़ते हुए पौधों को हानि पहुंचाने के अभ्यस्त हो जाते हैं, जिनका प्रसार जड़ों अथवा कटाई से