सुधारक और उनकी नियति
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III
वास्तव में यह किसी भी व्यक्ति द्वारा अनुसरण करने के लिए नैतिक जीवन का सर्वोच्च मानदंड था। गौतम बुद्ध के समय के आर्यों के समाज के लिए नैतिक जीवन का इतना ऊंचा मानदंड बिल्कुल अविदित था।
वह पवित्र जीवन व्यतीत करने का उदाहरण प्रस्तुत करके ही नहीं रुक गए। वह समाज में सामान्य पुरुषों और स्त्रियों के चरित्र को भी बनाना चाहते थे। उनके मार्ग दर्शन के लिए उन्होंने दीक्षा का एक ऐसा स्वरूप विकसित किया, जिसके बारे में आर्यों का समाज बिल्कुल अनभिज्ञ था। दीक्षा में यह व्यवस्था थी कि बौद्ध धर्म को अंगीकार करने वाले व्यक्ति को बुद्ध द्वारा निर्धारित कुछ नैतिक सिद्धांतों का पालन करने के लिए वचन देना पड़ता था। इन सिद्धांतों को पंचशील नाम से जाना जाता है। ये हैंः
(1) हत्या न करना,
(2) चोरी न करना,
(3) झूठ न बोलना,
(4) कामुक न बनना, और
(5) मादक पेयों का सेवन न करना।
ये पांच सिद्धांत आम लोगों के लिए थे। भिक्षुकों के लिए निम्न पांच और सिद्धांत थेः
(6) वर्जित समयों पर भोजन न करना,
(7) नृत्य, गायन में भाग न लेना अथवा नाट्य अथवा अन्य तमाशों में उपस्थित
न होना,
(8) फूलमालाओं, इत्रों और आभूषणों के इस्तेमाल से दूर रहना,
(9) ऊंचे अथवा चौड़ी शैयाओं के उपयोग से दूर रहना, और
(10) कभी भी धन ग्रहण न करना।
इन शीलों अथवा सिद्धांतों से एक आचरण संहिता बन गई थी, जिसका प्रयोजन स्त्रियों और पुरुषों के विचारों और कार्यों को नियमित करना था।
इनमें सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत हत्या न करने का था। बुद्ध ने जोर देकर यह बात स्पष्ट कर दी थी कि इस सिद्धांत का अर्थ केवल यही नहीं है कि जान लेने से बचना चाहिए। उन्होंने आग्रह किया कि इस सिद्धांत का अर्थ प्रत्येक जीवधारी के लिए सकारात्मक संवेदना, सद्भावना और पे्रम समझा जाना चाहिए।