सुधारक और उनकी नियति
में अत्यंत आश्चर्यजनक रूप में सफल हुए ख्1, ।’
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बुद्ध विवेक के सिद्धांत को उतनी ही दृढ़ता से मानते थे, जितनी दृढ़ता से वह पे्रम के सिद्धांत को मानते थे। उनकी मान्यता थी कि नैतिक जीवन का प्रारंभ ज्ञान के साथ होता है और उसकी समाप्ति विवेक के साथ होती है। वह ‘विश्व की रक्षा के लिए आए और इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए उनका तरीका अज्ञानता का विनाश, जीवन के सही मूल्यों एवं विवेकपूर्ण जीवन पद्धति के लिए ज्ञान का प्रसार करना था।’ बुद्ध ने यह दावा नहीं किया कि लोगों का उद्धार करने के लिए उनके पास शक्ति है। लोगों को स्वयं इसके लिए प्रयत्न करना है और ज्ञान के मार्ग पर चलकर उद्धार हो सकता है। उन्होंने ज्ञान पर इतना जोर दिया कि उनके विचार में ज्ञान के बिना नैतिकता कोई गुण नहीं है।
तीन चीजों के विरुद्ध बुद्ध ने महान अभियान छेड़ा था। उन्होंने वेदों की सत्ता को अस्वीकार किया...
दूसरे, उन्होंने धर्म के रूप में बलि की निंदा की। बलि के प्रति बुद्ध का रवैया एक कहानी के रूप में जातक-माला में भली-भांति वर्णित है। कहानी इस प्रकार हैः
बलि की कहानी
जिनके हृदय पवित्र हैं, वे दुष्टों के बहकावे में नहीं आते। यह जानते हुए हृदय की पवित्रता के लिए संघर्षरत रहना है। यही उपदेश निम्नलिखित से प्राप्त होगाः
यह कहा जाता है कि बहुत समय पहले बोधिसत्व नाम के एक राजा थे, जिन्होंने अपना राज्य आनुवांशिक उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त किया था। वह अपने पुण्य कार्यों के प्रभाव से इस स्थिति तक पहुंचे थे। वह शांतिपूर्वक अपने राज्य पर शासन करते थे। किसी प्रतिद्वंद्वी ने अशांति उत्पन्न नहीं की। उनकी प्रभुसत्ता को सार्वभौमिक मान्यता प्राप्त थी। उनका देश किसी भी प्रकार के कोप, प्रकोप अथवा विपदा से मुक्त था। अपने देश और बाहर के देशों के साथ उनके संबंध हर प्रकार से मधुर थे, और उनके सभी अधीनस्थ उनके आदेशों का पालन करते थे।
इस राजा ने अपने इच्छा रूपी शत्रुओं का दमन किया था और उसको ऐसे लाभों
प्रात-बुद्धिज्म, पृ. 49