4. सुधारक और उनकी नियति - Page 61

46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के प्रति कोई झुकाव नहीं था जिनका भोग करना बुरा माना जाता है, बल्कि उसकी मनोकामना अपनी प्रजा के सुख-संवर्धन की रहती थी। उसके कर्मों का एकमात्र प्रयोजन धर्माचरण था, वह एक मुनि की तरह व्यवहार करता था।

  1. वह मानव स्वभाव को जानता था, लोग सबसे श्रेष्ठ मानव के व्यवहार का अनुकरण करना महत्वपूर्ण मानते हैं, इसलिए अपनी प्रजा को निर्वाण दिलाने की इच्छा से उसने खासतौर से धार्मिक कृत्यों के निष्पादन की ओर विशेष ध्यान दिया।

  2. वह भिक्षा-दान करता था, नैतिक आचरण (शील) के सिद्धांतों का कठोरता से पालन करता था, सहिष्णुता की ओर ध्यान देता था और प्राणियों के लाभ के लिए संघर्ष करता था। अपने विचारों के अनुरूप विनम्र स्वरूप था, वह अपनी प्रजा की प्रसन्नता के लिए समर्पित रहता था और धर्म का साकार रूप दिखाई देता था।

एक बार ऐसा हुआ कि उसके द्वारा रक्षित रहते हुए भी, उसके राज्य के कई जिले, उनके निवासियों के दोषपूर्ण कार्यों और वर्षा का ध्यान रखने वाले देवों की गलती के परिणामµस्वरूप सूखे और इस आपदा के विक्षोभकारी प्रभावों से पीडि़त हो गए। अतः राजा को यह पूर्ण विश्वास हो गया कि उस पर यह विपत्ति स्वयं उसके अथवा उसकी प्रजा द्वारा धर्मपरायणता का उल्लंघन किए जाने के फलस्वरूप आई है और जिन लोगों के कल्याण के प्रति वह दृढ़-प्रतिज्ञ था, उनके कष्ट से उसे हार्दिक वेदना हुई, इसलिए उसने धार्मिक मामलों में अपने ज्ञान के लिए प्रख्यात ज्ञानियों और क्षमता-संपन्न लोगों से सलाह ली। उसने अपने परिवार के पुरोहित की अध्यक्षता में वयोवृद्ध ब्राह्मणों और अपने मंत्रियों को सलाह के लिए बुलाया और उनसे इस विपत्ति से छुटकारा पाने के लिए कुछ उपाय पूछे। उन्होंने वेदों के अनुसार बलि में विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि इससे ही पर्याप्त वर्षा हो सकती है। उन्होंने राजा को इस प्रकार की भयावह बलि देने का सुझाव दिया, जिसमें सैंकड़ों जीवधारियों की हत्या अपेक्षित है। लेकिन इस प्रकार की हत्या से संबंधित ऐसी हर बात की सूचना प्राप्त कर लेने पर जोकि बलि के लिए विहित है, उसके सहज करुणाभाव ने उनकी सलाह मानने से मन ही मन में इंकार कर दिया। फिर भी शिष्टतावश अस्वीकृति के कठोर शब्दों से वह उन्हें आहत नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने इस मुद्दे से हटकर बातचीत का रुख अन्य विषयों की तरफ मोड़ दिया। दूसरी ओर, राजा के मनोभावों से अनभिज्ञ उन लोगों को जब भी धार्मिक मामलों पर राजा से बातचीत का मौका मिलता, तभी वे बलि के लिए उन्हें सचेत करते रहते।