4. सुधारक और उनकी नियति - Page 62

सुधारक और उनकी नियति

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  1. ‘आप भूमि पर अधिकार प्राप्त करने और उस पर शासन करने के लिए निर्धारित विभिन्न प्रकार के राजकीय कर्त्तव्यों का समय पर निष्पादन करने का निरंतर ध्यान रखते हैं। इन कार्यों की संपन्नता धर्मपरायणता के सिद्धांतों के अनुरूप है।

  2. ‘जब कि आप (सभी अन्य मामलों में) ‘त्रयी’ (धर्म, अर्थ और काम) का अनुपालन इतनी चतुराई से करते हैं, अपने लोगों के हित में रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, तब क्या कारण है कि आप देवों की दुनिया तक पहुंचाने वाले उस पुल के संबंध में, जिसका नाम ‘बलि’ है, इतने लापरवाह और लगभग निष्क्रिय हैं?

  3. ‘सेवकों की तरह राजा (आपके अधीनस्थ) आपके आदेशों का इस विश्वास के साथ आदर करते हैं कि उनसे सफलता निश्चित है। अपने शत्रुओं का विनाश करने वाले, हे राजन, अब समय आ गया है कि आप बलि के जरिए अपने यश में वृद्धि करने वाले वरदान प्राप्त करें।

7.8. ‘दान की अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति और संयम (अच्छा आचरण) बरतने में कठोरता के कारण एक दीक्षित के लिए अपेक्षित पवित्रता पहले से ही आपके पास है, तथापि आपके लिए यह उपयुक्त होगा कि आप ऐसी बलि द्वारा, जिनके वर्ण्य विषय वेद हैंµदेवों का ऋण चुकाएं। उपयुक्त तथा निर्दोष रूप से कराई गई बलि से संतुष्ट होकर देवता बदले में वर्षा भेजकर प्राणियों का सम्मान करते हैं। इस प्रकार विचार करते हुए अपने प्रजाजन और स्वयं अपने कल्याण के बारे में सोचिए और नियमित रूप से बलि की स्वीकृति दीजिए, जिससे आपकी कीर्ति बढ़ेगी।’

इस पर राजा के मन में यह विचार आया, ‘ऐसे नेताओं के विश्वास पर अवलंबित मुझमें निरीह व्यक्ति वास्तव में असम्यक रूप से रक्षित है। विधान पर निष्ठापूर्वक विश्वास करते हुए और उसका आदर करते हुए भी दूसरों के शब्दों पर निर्भरता मेरी सहृदयता के गुण को समूल नष्ट कर देगी।

  1. ‘लोगों में जो सर्वोत्तम आश्रयदाता के रूप में विख्यात हैं, वही लोग विधि-विधान के आधार पर अपने तर्कों द्वारा नुकसान पहुंचाने का इरादा रखते हैं। ऐसा व्यक्ति जो उनके द्वारा दिखाए गए गलत रास्ते का अनुसरण करता है, वह शीघ्र ही स्वयं को संकटग्रस्त पाएगा, क्योंकि वह बुराइयों से घिर जाएगा।

  2. ‘धर्मपरायणता और पशुओं के उत्पीड़न के बीच क्या संबंध हो सकता है? देव लोक में मेरे आवास अथवा देवताओं की आराधना का उत्पीडि़तों की हत्या से क्या सरोकार है?