50 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जब राज्य के निवासियों को उनके राजा द्वारा बलि के लिए भेंट चढ़ाने के इरादे से बुरे कर्म करने वालों की सावधानी से की जा रही खोज के बारे में जानकारी मिली, क्योंकि वे दिन-प्रतिदिन अत्यंत भयावह राज-उद्घोषणा सुनते थे और दुष्टजन को खोजने और पकड़ने के लिए नियुक्त किए गए राजा के सेवकों को अक्सर सर्वत्र देखते थे, तो उन्होंने बुरे आचरण के प्रति आसक्ति का त्याग कर दिया और नैतिक सिद्धांतों तथा आत्म-संयम का कठोरता से पालन करने का इरादा कर लिया। वे घृणा और शत्रुता के हर अवसर का त्याग करते रहे और अपने झगड़ों और मतभेदों को निपटाते हुए उन्होंने आपसी पे्रम और आदर-भाव को बढ़ावा दिया। उनमें माता-पिता तथा गुरुजन की आज्ञा का पालन, उदारता और दूसरों से सहयोग की सामान्य भावना, शिष्ट व्यवहार और नम्रता जैसे गुणों का समावेश हो गया। संक्षेप में, वे ऐसे रहते थे, जैसे कि कृत-युग (ब्राह्मण-काल) में रहते हों।
मृत्यु के भय ने उनमें परलोक के विचार जागृत कर दिए थे, अपने परिवारों के सम्मान को कलंकित करने के जोखिम ने उन्हें अपनी ख्याति की रक्षा करने के लिए पे्ररित किया था, उनके हृदय की महान पवित्रता ने उनके लोकलाज के भाव को मजबूत बना दिया था। इन कारणों से शिष्ट व्यवहार वाले लोगों की शीघ्र ही पहचान कर ली जाती थी।
यद्यपि हर व्यक्ति पवित्र आचरण बनाए रखने के बारे में पहले से कहीं अधिक कटिबद्ध था, तथापि राज के सेवकों ने बुरे कर्म करने वालों की सतर्कता पूर्वक की जा रही खोज में कमी नहीं आने दी। इस कारण से भी लोगों की धर्मपरायणता में गिरावट नहीं आई।
राजा को अपने दूतों से जब राज्य की इस स्थिति की जानकारी प्राप्त हुई, तो वह अत्यधिक प्रसन्न हुआ। उसने शुभ समाचार लाने वाले संदेशवाहकों को पुरस्कार के रूप में बहुमूल्य उपहार प्रदान किए और अपने मंत्रियों को कुछ इस प्रकार बोलते हुए आदेश दियाः
22-24. ‘आपको मालूम है कि मेरी सर्वोच्च इच्छा अपनी प्रजा की रक्षा करना है। अब वे बलि के उपहारों को प्राप्त करने योग्य बन गए हैं और बलि के उद्देश्य से ही मैंने यह संपत्ति प्रदान की है। मेरे विचार से बलि को उचित रूप से जिस प्रकार संपन्न किया जाता है, मैं उसे उसी तरह पूरा करना चाहता हूं। जो भी व्यक्ति इस आशय से धन की कामना करता है कि इससे उसकी प्रसन्नता में वृद्धि होगी, उसे अपनी इच्छा की संतुष्टि के लिए मुझसे धन प्राप्त करने के लिए मेरे पास आने दें। इस प्रकार जिस कष्ट और अभाव से हमारा देश पीडि़त है, वह शीघ्र ही दूर हो जाएगा। वास्तव में जब