4. सुधारक और उनकी नियति - Page 66

सुधारक और उनकी नियति

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भी मैं अपनी प्रजा की रक्षा के प्रति अपने दृढ़-संकल्प और इस कार्य में आप सरीखे उत्कृष्ट साथियों से प्राप्त होने वाले असीम सहयोग के बारे में सोचता हूं, तो अक्सर मुझे ऐसा लगता है जैसे कि मेरे लोगों की पीड़ाएं मेरे क्रोध को भड़का कर मेरे मस्तिष्क में ज्वाला की तरह प्रज्ज्वलित हो रही हैं।’

मंत्रियों ने राजाज्ञा को स्वीकार किया और उसे शीघ्र अमल में लाने लगे। उन्होंने सभी गांवों, नगरों और बाजारों और उसी तरह सड़कों पर सभी स्थानों पर भिक्षा-गृहों की स्थापना के लिए आदेश दिए। इस कार्य के संपन्न हो जाने के बाद उन्होंने उन सभी के लिए जो अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए भीख मांगते थे, दिन-प्रतिदिन वे सभी चीजें उसी प्रकार दान-स्वरूप देने की व्यवस्था की, जिस प्रकार राजा ने आदेश दिया था।

  1. इस प्रकार निर्धनता दूर हो गई और राजा से धन मिलने पर विविध और अच्छी पोशाकें तथा आभूषण पहन-संवरकर लोगों ने उत्सव जैसे दिनों की भव्यता का प्रदर्शन किया।

  2. आनंदित उपहार प्राप्तकर्ताओं के गुणगानों से राजा की कीर्ति सभी दिशाओं में उसी प्रकार फैल गई, जैसे झील की छोटी-छोटी तरंगों द्वारा संवाहित कमल-पुष्पों का पराग सतह पर फैलता ही चला जाता है।

  3. और अब अपने शासक द्वारा उठाए गए विवेकपूर्ण कदमों के परिणाम स्वरूप सभी लोग शिष्ट व्यवहार के अभ्यस्त हो गए, तो समृद्धि के पे्ररक इन सभी गुणों के विकास द्वारा पराजित कष्ट और विपत्तियां लुप्त हो गईं।

  4. सदा समय से ऋतुएं आने लगीं और अपनी नियमित रूप से प्रत्येक व्यक्ति को आनंदित करने लगीं और राजा के नए स्थापित कार्य-व्यापार की भांति विधिसम्मत रूप से चलने लगीं। इसलिए पृथ्वी पर्याप्त मात्रा में विभिन्न प्रकार के अनाज उगाने लगी और वहां भरपूर जल सुलभ रहता और सभी जलाशय कमलों से भरे रहते।

  5. संक्रामक रोग मानव-जाति को ग्रसित नहीं करते थे, चिकित्सीय जड़ी-बूटियां बहुत ही प्रभावशाली बन गई थीं। वर्षा सदा समय से और नियमित रूप से आने लगी ओर तारामंडल शुभ मार्ग से गुजरने लगा।

  6. बाहर से अथवा राज्य के भीतर से या अव्यवस्था फैलाने वाले खतरनाक तत्वों की ओर से कहीं भी कोई भय नहीं था। धर्मपरायणता, आत्म-संयम, शिष्ट व्यवहार और नम्रता का जीवनयापन करते हुए इस देश के लोगों को लग रहा था, मानो वे कृत युग के लाभों का उपयोग कर रहे हैं।

इस प्रकार विधि के सिद्धांतों के अनुसार त्याग-तपस्या करने की राजा की शक्ति द्वारा कष्ट और विपत्तियों की समात्ति के साथ निर्धनों की पीड़ाएं भी दूर हो गईं और