52 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
देश समृद्ध हो गया तथा उसकी संपन्न जनता को आनंद की अनुभूति प्राप्त हुई। तद्नुसार वहां के लोग अपने राजा का गुणगान करने और सभी दिशाओं में उसकी ख्याति का विस्तार करने से कभी नहीं थकते थे।
एक दिन एक उच्च अधिकारी जिसका हृदय सत्य (निष्ठा) में प्रवृत्त था, इस प्रकार राजा से बोला, ‘सच ही, यह एक सच्ची कहावत है।
‘राजा अपने विवेक से कितने ही बुद्धिमान लोगों को पीछे छोड़ देते हैं, क्योंकि उन्हें सदा सभी प्रकार के कार्यों और सबसे ऊंचे, सबसे निचले और मध्यम वर्ग के लोगों से निबटना पड़ता है। महामहिम, क्योंकि आपने पशु-हत्या का दोषी बनने के पाप से मुक्त होकर धर्मपरायणता में जो त्याग-तपस्या का अनुष्ठान किया है, उसके प्रभाव से अपनी प्रजा के लिए इस लोक और परलोक का सुख प्राप्त कर लिया है। अब संकट के दिन बीत गए हैं और गरीबी के कष्ट समाप्त हो गए हैं, क्योंकि लोग अच्छे आचरण के सिद्धांतों में परिपक्व हो चुके हैं। अधिक कहने से क्या लाभ? आपकी प्रजा प्रसन्न है।
‘आपके अंगों को आच्छादित करने वाला काले हिरन का चर्म उज्ज्वल चंद्रमा में विद्यमान काले धब्बे के समान है, और न ही आपके ऊपर दीक्षित होने के कारण जो संयम थोपा गया है, वह आपके व्यवहार के सहज सौंदर्य को बाधित नहीं कर सकता। दीक्षा के अनुष्ठानों के अनुरूप आपने सिर पर जो वस्त्र धारण किया है, उसकी चमक आपके द्वारा पहले से धारण किए गए राज-छत्र की भव्यता से कम नहीं है। और अंत में यह बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि आपकी विशाल हृदयता ने ख्याति प्राप्त लोगों को पीछे छोड़ दिया है और एक सौ बलि देने वाले की प्रसिद्धि के अंहकार को चूर कर दिया है।
‘हे बुद्विमान राजन्, नियमानुसार किसी कामना की प्राप्ति की आकांक्षा रखने वाले लोगों द्वारा कराई गई बलि एक कुकृत्य है, क्योंकि उसके द्वारा जीवधारियों की हत्या की जाती है। इसके विपरीत आपके द्वारा किया गया त्याग आपकी कीर्ति का स्मारक है और आपके सुंदर व्यवहार और बुराई के प्रति आपकी विमुखता के पूर्णरूप से अनुरूप है।
‘आपकी प्रजा प्रसन्न है, जिसे आप जैसा संरक्षक प्राप्त है। यह निश्चित है कि कोई भी पिता अपने बच्चों का आपसे बेहतर अभिभावक नहीं बन सकता।’
एक अन्य अधिकारी ने कहाः
- ‘अगर समृद्ध व्यक्ति दान देते हैं, तो वे सदगुण अपनाने की आशाओं से पे्ररित होते हैं। अच्छा अचारण भी लोगों में उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त करने अथवा मृत्यु के पश्चात स्वर्ग पहुंचाने की अभिलाषा से किया जाता है। लेकिन ये दोनों प्रकार के कार्य, जिनका प्रतिपादन दूसरों को लाभान्वित करने के लिए आपकी दक्षता में दुष्टिगोचर होता है, केवल उन्हीं लोगों द्वारा किए जा सकते हैं, जो ज्ञान और सद्गुणों के प्रयास से परिपूर्ण