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सुधारक और उनकी नियति

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हैं। इस प्रकार पवित्र हृदय की पवित्रता के लिए संघर्ष किया जाना चाहिए। (राजा के लिए आध्यात्मिक उपदेशों में यह भी कहा जाना चाहिएः जो अपनी प्रजा की भलाई की कामना करते हुए स्वयं प्रयास करता है, और इस प्रकार निर्वाण, कीर्ति और प्रसन्नता लाता है, इसके सिवाय जिसका कोई कार्य नहीं है, वही राजा है।’

और इसमें निम्नलिखित यह जोड़ा जा सकता हैः ‘जो (राजा) भौतिक समृद्धि के लिए प्रयास करता है, उसे यह सोचते हुए कि उसकी प्रजा का धार्मिक आचरण ही समृद्धि का स्त्रोत है, स्वयं धर्म के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चाहिए।’

इसमें आगे यह कहा जाना चाहिएः ‘पशुओं की हत्या करने से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, बल्कि इसे प्राप्त करने की शक्ति दान, आत्म-संयम, इंद्रिय-निग्रह आदि में निहित है और इसी कारण से जो भी मोक्ष की कामना करता है, उसे इन गुणों के लिए स्वयं प्रयास करना चाहिए।’ और तथागत के संबंध में चर्चा करते समय यह भी कहा गया हैः ‘इस प्रकार स्वामी ने, जब कि वह अभी तक अपने पूर्व अस्तित्व में थे, विश्व के हितों का ध्यान रखने की प्रवृत्ति जताई।’

IV

बलि के विरुद्ध दूसरा प्रबल प्रहार कूटदंत सुत्त के नाम से विख्यात उनके प्रवचनों में निहित है। यह इस प्रकार हैः

उचित और अनुचित बलि

  1. इस प्रकार मैंने सुना है। जब एक बार महाभाग लगभग पांच सौ बांधवों की भारी भीड़ के साथ यात्रा करते समय मगध से गुजर रहे थे, तो वह ब्राह्मणों के खानुमाता नामक एक गांव में पहुंचे और वहां अम्बलत्तिका विहारोद्यान में ठहरे।

उस समय ब्राह्मण कूटदंत खानुमाता में ही रहता था। वह एक ऐसा स्थान था, जिसमें जीवन का स्पंदन था, काफी हरित भूमि और वन्य भूमि थी, पर्याप्त मात्रा में जल और अनाज था। मगध के राजा बिम्बसार ने उपहार स्वरूप उसे यह क्षेत्र भेंट किया था। उस पर उसका ऐसा अधिकार था, मानो वह वहां का राजा हो। और तभी ब्राह्मण कूटदंत की ओर से एक विशाल बलि की तैयारी की जा रही थी। सौ सांडों, सौ बछड़ों, सौ बछियों, सौ बकरियों और भेड़ों को बलि-स्थल पर लाया गया था।

  1. जब खानुमाता के ब्राह्मणों और परिवारवालों ने श्रमण गौतम के पहुंचने का समाचार सुना, तो उन्होंने साथियों और भृत्यों के साथ अम्बलत्तिका विहारोद्यान जाने के लिए खानुमाता से प्रस्थान करना शुरू कर दिया।