4. सुधारक और उनकी नियति - Page 69

54 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

  1. और तभी ब्राह्मण कूटदंत मध्याह्न विश्राम के लिए अपने मकान के ऊपर की छत पर चला गया था। इस प्रकार लोगों को जाते हुए देखकर उसने अपने द्वारपाल से इसका कारण पूछा। द्वारपाल ने उसे कारण बताया।

  2. तब कूटदंत ने सोचाः ‘मैंने यह सुना है कि श्रमण गौतम तीन उपायों और उसके सोलह सहायक उपकरणों से बलि के सफल निष्पादन के बारे में समझ रखते हैं। लेकिन मुझे इस सबकी जानकारी नहीं है, फिर भी मैं बलि देना चाहता हूं। मेरे लिए यह अच्छा रहेगा कि मैं श्रमण गौतम के पास जाऊं और उसके बारे में उनसे पूछूं।’

इसलिए उसने अपने द्वारपाल को खानुमाता के ब्राह्मणों और अन्य गृहस्थों के पास यह कहने के लिए भेजा कि वे उसकी प्रतीक्षा करें, जिससे कि वह उनके साथ ही महाभाग से मिलने जा सके।

  1. लेकिन उस समय विशाल बलि में भाग लेने के लिए बहुत से ब्राह्मण गांव में ठहरे हुए थे। और जब उन्होंने इस बारे में सुना तो वे कूटदंत के पास गए और उसे वहां न जा2ने के लिए उसी आधार पर समझाया, जिस आधार पर ब्राह्मणों ने पहले सोनदंड को समझाया था। लेकिन उसने भी उन्हें उसी प्रकार का उत्तर दिया, जैसा कि सोनदंड ने उन ब्राह्मणों को दिया था। तब वे संतुष्ट हो गए और उसके साथ ही महाभाग से मिलने चले गए।

  2. कूटदंत ब्राह्मण ने आसन ग्रहण करने के बाद महाभाग को वह सब-कुछ बताया, जो उसने सुना था और उनसे प्रार्थना की कि वे उसे तीन उपायों और सोलह प्रकार के सहायक उपकरणों से बलि के सफल निष्पादन के बारे में बताएं।

‘अच्छा, तो हे ब्राह्मण, ध्यान से सुनो और मैं बताऊंगा।’

‘बहुत अच्छा, श्रीमन्’, कूटवंत ने उत्तर में कहा, और महाभाग ने निम्न प्रकार से बखान कियाः

  1. हे ब्राह्मण, बहुत समय पहले महाविगत नामक शक्तिशाली राजा था। उसके

पास बहुत धन और विपुल संपत्ति थी, चांदी और सोने के भंडार थे, आनंद के

अपार साधन थे, वस्तुओं और अनाज के आगार थे और उसके कोष तथा धान्यागार

भरे रहते थे। जब एक बार राजा महाविगत अकेले ध्यानमग्न था, उसे इस विचार

से चिंता हुई कि मेरे पास सभी अच्छी वस्तुओं की प्रचुरता है, जिसका कोई नश्वर

व्यक्ति जी भरकर उपभोग कर सकता है, संपूर्ण पृथ्वी वृत्त विजय द्वारा मेरे स्वामित्व

में है, कितना अच्छा होता अगर मैं एक महान बलि दे सकता, जिससे बहुत दिनों

तक मेरा सुख और कल्याण सुनिश्चित हो जाता। और उसने ब्राह्मण को जो उसका

पुरोहित था, बुलाया, जो कुछ भी उसने सोचा था, उसे बताया और कहा, हे ब्राह्मण,