सुधारक और उनकी नियति
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मैं बहुत दिनों तक अपने सुख-शांति और कल्याण के लिए एक विशाल बलि देना चाहता हूं, इसलिए, श्रद्धेय, मुझे अनुदेश दें कि यह कृत्य कैसे संपन्न कराया जा सकता है।’
- इस पर ब्राह्मण ने, जो पुरोहित था, राजा से कहाः ‘श्रीमन्, राजा का देश संकट-ग्रस्त तथा लूटपाट से उत्पीडि़त है। देश से बाहर जो डाकू हैं, वे गांवों और नगरों में डाका डालते हैं और सड़कों को असुरक्षित बनाते हैं। जब तक ऐसी स्थिति रहती है, तब तक राजा कोई नया कर लगा दें, तो सचमुच महामहिम का यह कार्य अनुचित होगा। लेकिन संयोगवश महामहिम यह भी सोच सकते हैं कि मैं, अपमानित तथा देश-निष्कासित करके, दंडित करके और कारावास तथा मृत्यु-दंड द्वारा शीघ्र ही इन दुष्टों का प्रपंच समाप्त कर दूंगा। लेकिन उनका स्वेच्छाचार पूर्ण रूप से समाप्त नहीं किया जा सकता, जो दंडित होने से बच निकलेंगे, वे राज्य में परेशानी पैदा करते रहेंगे। इस अव्यवस्था को पूर्ण रूप से समाप्त करने के लिए एक उपाय काम में लाया जा सकता है। राजा के राज्य में जो भी लोग पशुपालन और खेती करते हैं, उन्हें महामहिम खाद्य तथा बीज प्रदान करें। राजा के राज्य में जो भी लोग व्यापार करते हैं, उन्हें महामहिम पूंजी प्रदान करें। राजा के राज्य में जो भी लोग सरकारी सेवा करते हैं, उन्हें महामहिम वेतन और खाद्य प्रदान करें। तब वे लोग अपना-अपना कारोबार करते हुए कभी भी राज्य में संकट उत्पन्न नहीं करेंगे। राजा का राजस्व बढ़ेगा, देश में शांति रहेगी और एक-दूसरे के साथ सुख-चैन से निर्वाह करते हुए सामान्य जन अपनी बाहों में अपने बच्चों को झुलाते हुए द्वार खुला रखकर रहेंगे।’
हे ब्राह्मण, राजा महाविगत ने अपने पुरोहित की बात मान ली और उसी के कथनानुसार कार्य किया। और अपना-अपना कारोबार करते हुए उन लोगों ने कभी राज्य में कठिनाई उत्पन्न नहीं की। राजा का राजस्व बढ़ गया और देश में सुख-शांति छा गई। सामान्य जन एक-दूसरे के साथ सुख-चैन से निर्वाह करते हुए अपनी बाहों में अपने बच्चों को झुलाते हुए द्वार खुले रखकर रहने लगे।
- तब राजा महाविगत ने अपने पुरोहित को बुलवाया और उससे कहाः ‘अव्यवस्था समाप्त हो गई है। देश में शांति है। मैं बहुत दिनों तक अपनी सुख-शांति और कल्याण के लिए महान बलि देना चाहता हूं, इसलिए, श्रद्धेय, मुझे अनुदेश दें कि यह कृत्य कैसे संपन्न कराया जा सकता है।’
‘तो राजा के राज्य में जो भी क्षत्रिय हों, उनके भृत्य हों, चाहें वे देहात में हों अथवा नगरों में हों, अथवा जो उनके मंत्री और कर्मचारी हों, चाहे वे देहात में हों अथवा नगरों में हों, अथवा जो मान्य ब्राह्मण हों, चाहे वे देहात में हों अथवा नगरों