4. सुधारक और उनकी नियति - Page 73

58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बोलते हैं और ऐसे भी जो झूठ नहीं बोलते, ऐसे मनुष्य जो पर निंदा करते हैं और ऐसे भी जो ऐसा नहीं करते, ऐसे मनुष्य जो अशिष्टता से बोलते हैं और ऐसे भी जो ऐसा नहीं करते, ऐसे मनुष्य जो व्यर्थ की बातें करते हैं और ऐसे भी जो उनसे अलग रहते हैं, ऐसे मनुष्य जो लोभ करते हैं और ऐसे भी जो लोभ नहीं करते, ऐसे मनुष्य जो दुर्भावना रखते हैं और ऐसे भी जो दुर्भावना नहीं रखते, ऐसे मनुष्य जिनके विचार अनुपयुक्त होते हैं और ऐसे भी जिनके विचार उपयुक्त होते हैं। इनमें से जो भी बुरा कार्य करता है, उसे उसके कर्म पर छोड़ दें। जो अच्छा कार्य करते हैं, उन्हें महामहिम भेंट प्रदान करें। राजन्, उनके लिए अनुष्ठानों की व्यवस्था करें, उन्हें संतुष्टि दें, जिससे हमें भी आंतरिक शांति प्राप्त हो सकेगी।’

  1. और फिर, हे ब्राह्मण, जब कि राजा बलिदान करा रहे थे तो पुरोहित ने सोलह उपायों से उनको अनुदेश दिया, पे्ररित किया और हर्षित किया। उसने कहा, ‘जब कि राजा बलिदान करा रहे हैं, उनके बारे में लोग अगर यह कहेंः राजा महाविगत अपनी प्रजा के चार वर्णों को आमंत्रित किए बिना, स्वयं आठ व्यक्तिगत गुणों से संपन्न न होने पर भी और चार व्यक्तिगत गुणों से मुक्त ब्राह्मण की सहायता के बिना बलिदान करा रहे हैं, तो उनका यह कथन तथ्य के अनुसार नहीं होगा। क्योंकि चार वर्णों की सहमति प्राप्त कर ली गई है और राजा आठ व्यक्तिगत गुणों से तथा उनके ब्राह्मण चार व्यक्तिगत गुणों से संपन्न हैं। जहां तक इन सोलह शर्तों में से प्रत्येक का संबंध है, राजा को इस बात से आश्वस्त किया जा सकता है कि हर शर्त पूरी कर ली गई। वह बलिदान करा सकते हैं, प्रसन्न हो सकते हैं और अपने मन की शांति प्राप्त कर सकते हैं।’

  2. और फिर, हे ब्राह्मण, उस बलिदान में न तो कोई बैल, न बकरियां, न मुर्गे, न मांसल सुअर और न किसी प्रकार के जीवित प्राणी ही मारे गए। खंभों के रूप में इस्तेमाल करने के लिए कोई वृक्ष नहीं काटे गए और बलिदान-स्थल के चारों ओर विकीर्ण करने के लिए न कोई घास ही काटी गई। और वहां नियुक्त किए गए दासों, दूतों और कर्मचारियों को न तो डंडों से हांका जा रहा था और न वे भय से त्रस्त थे। काम करते हुए न तो वे रो रहे थे और न उनके चेहरे अश्रुपूरित थे। जो भी मदद करना चाहता था, वह काम करता था। जो मदद नहीं करना चाहता था, वह काम नहीं करता था। सभी अपनी रुचि के अनुकूल कार्य करते थे। जिस कार्य में उनकी रुचि नहीं थी, उसे वे बिना किए छोड़ देते थे। घी और तेल, दूध और मक्खन, शहद और खांड से ही वह बलिदान संपन्न किया गया।