सुधारक और उनकी नियति
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- और फिर, हे ब्राह्मण, क्षत्रिय, भृत्यु, और मंत्री तथा कर्मचारी, प्रतिष्ठित
ब्राह्मण और महत्वपूर्ण गृहस्थ, चाहे वे देहात के हों अथवा नगरों के, अपने साथ
काफी धन-संपत्ति लेकर राजा महाविगत के पास गए और उन्होंने कहा, ‘यह प्रचुर
धन संपत्ति हम राजा के उपयोग के लिए लाए हैं। महामहिम, हमारे हाथों से इसे
ग्रहण कर लें। इस पर राजा महाविगत ने कहा ‘मित्रों, मेरे पास पर्याप्त धन-संपत्ति
है। कराधान की राशि ही बहुत है। आप अपनी संपत्ति रखिए और अपने साथ और
भी ले जाइए।’
इस प्रकार राजा द्वारा उनकी बात मानने से इंकार कर दिए जाने पर, वे एक
तरफ चले गए और उन्होंने एक-दूसरे के साथ इस प्रकार विचार-विमर्श किया-यदि
हम इस धन-संपत्ति को पुनः अपने घरों को वापस ले जाएं, तो यह हमारे लिए
उचित नहीं होगा। राजा महाविगत महान बलिदान कर रहे हैं। हमें भी इस कार्य में
योगदान करना चाहिए।
- इसलिए राजा द्वारा निर्मित बलिदान-स्थल के पूर्व में क्षत्रियों ने, दक्षिण में
कर्मचारियों ने, पश्चिम में ब्राह्मणों ने और उत्तर में अन्य गृहस्थों ने निरंतर दान की
व्यवस्था की। उसमें जो वस्तुएं और उपहार दिए गए, वे स्वयं राजा महाविगत के
महान बलिदान के अनुरूप थे।
इस प्रकार, हे ब्राह्मण, यह एक चंहुमुखी सहयोग था। राजा महाविगत आठ
व्यक्तिगत गुणों से और उनके पालक ब्राह्मण चार गुणों से संपन्न थे, और उस बलिदान
को कराने की तीन विधियां थीं। हे ब्राह्मण, इस सोलह प्रकार के उपस्कारों से युक्त
त्रिगुणात्मक विधि से निष्पादित बलिदान को उपयुक्त उत्सव कहा जा सकता है।
- और तब, उन ब्राह्मणों ने ऊंचे स्वर में कहाः ‘कितना भव्य है यह बलिदान और कितना पवित्र है इसका निष्पादन।’
लेकिन कूटदंत ब्राह्मण वहां मौन बैठा रहा।
तब उन ब्राह्मणों ने कूटदंत से कहाः ‘आप श्रमण गौतम के सही कथन का यह कहकर अनुमोदन क्यों नहीं करते कि उन्होंने ठीक कहा है?’
ब्राह्मण कूटदंत ने कहा, ‘मैं अवश्य अनुमोदन करता हूं, क्योंकि श्रमण गौतम के सही कथन का जो यह कहकर अनुमोदन नहीं करता है कि उन्होंने ठीक कहा है, तो सचमुच उसका सिर दो भागों में विभक्त हो जाएगा। लेकिन मैं इस बात पर विचार कर रहा था कि श्रमण गौतम यह नहीं कहते हैं कि इस प्रकार मैंने सुना है। न वह यह कहते हैं कि ‘इस प्रकार यह अवश्य अनुपालनीय है।’ वह केवल यह कहते हैंµ‘तब यह इस प्रकार था’, अथवा वह कहते हैं, ‘तब वह वैसा था।’ इसलिए मेरी यह धारणा है कि निश्चित रूप से उस समय श्रमण गौतम ही स्वयं राजा महाविगत रहे होंगे,