60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अथवा वह ब्राह्मण रहे होंगे जिसने उस बलिदान में उनके कार्यपालक के रूप में कार्य किया होगा। क्या श्रद्धेय गौतम यह स्वीकार करते हैं कि जो इस प्रकार के बलिदान का उत्सव मनाता है, अथवा मनवाता है, वह मृत्यु के पश्चात शरीर के विलीन हो जाने पर स्वर्ग में किसी आनंद की अवस्था में पुनर्जन्म लेता है।’
‘हां, हे ब्राह्मण, मैं यह स्वीकार करता हूं। और उस समय मैं वही ब्राह्मण था, जिसने पुरोहित के रूप में वह बलिदान कराया था।’
- ‘हे गौतम, क्या कोई ऐसा अन्य बलिदान है, जो इसकी तुलना में कम कठिन और कम कष्टकर हो और जिसका फल और लाभ इससे अधिक हो?’
‘हां, हे ब्राह्मण, ऐसा है।’
‘हे गौतम, वह क्या हो सकता है?’
‘एक परिवार में निरंतर रखे जाने वाले वे उपहार जो विशेष रूप से सदाचारी संन्यासियों को प्रदान किए जाते हैं।’
- ‘लेकिन इसका क्या कारण है कि एक परिवार में रखे गए उपहारों का, विशेष रूप से सदाचारी संन्यासियों को निरंतर प्रदान किया जाना, तीन विधियों और सोलह प्रकार के उपसाधनों से संपन्न किए जाने वाले अन्य बलिदान की तुलना में कम कठिन और कम कष्टकर हैं, अधिक फलदायक और लाभप्रद हैं?’
‘हे ब्राह्मण, बाद में बताए गए बलिदान को न तो अर्हत और न अर्हत मार्ग पर प्रवत्त कोई अन्य कराएगा। और ऐसा क्यों नहीं होगा? क्योंकि उसमें लाठियों से प्रहार किया जाता है और गले से पकड़ा जाता है। लेकिन वे पूर्वोक्त बलिदान में जाएंगे, क्योंकि उसमें ऐसा नहीं होता है। इसलिए इस प्रकार के निरंतर उपहार अन्य प्रकार के बलिदान से श्रेष्ठ होते हैं।’
- ‘और, हे गौतम, इन दोनों में से किसी की भी तुलना में कोई अन्य बलिदान है, जो अपेक्षाकृत कम कठिन और कष्टकर है, किंतु अधिक फलदायक और लाभप्रद हो?’
‘हां, हे ब्राह्मण, ऐसा है।’
‘और, हे गौतम, वह क्या हो सकता है?’
‘संघ की ओर से चारों दिशाओं में विहारों का निर्माण।’
- ‘और, हे गौतम, इन तीनों में से किसी एक और तीनों की तुलना में क्या कोई अन्य बलिदान है, जो अपेक्षाकृत कम कठिन और कष्टकर है, किंतु अधिक फलदायक और लाभप्रद हो?’
‘हां, हे ब्राह्मण, ऐसा है।’