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सुधारक और उनकी नियति

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‘और, हे गौतम, वह क्या हो सकता है?’

‘जो निष्ठापूर्ण हृदय से एक बुद्ध को अपने मार्गदर्शक के रूप में ग्रहण करता है, सत्य और संघ को ग्रहण करता है, वह एक ऐसा बलिदान है, जो खुले दान-गृह से श्रेष्ठ है, सतत भिक्षादान से श्रेष्ठ है और आवास-स्थान के उपहार से श्रेष्ठ है।

  1. ‘और, हे गौतम, इन चारों की तुलना में क्या कोई अन्य बलिदान है, जो अपेक्षाकृत कम कठिन और कष्टकर, किंतु अधिक फलदायक और लाभप्रद हो?’

‘जब कोई मनुष्य निष्ठापूर्ण हृदय से संयम के द्वारा जीवन को नष्ट होने से बचाता है, जो वस्तुएं उसको नहीं दी गई हैं, उनको लेने से परहेज करता है, ऐंद्रिय आसक्तियों के संबंध में बुरे आचरण का परित्याग करता है, मिथ्या वचनों का परित्याग करता है, मादक और पागल करने वाले पेय का त्याग करता है जो लापरवाही की जड़ है, तो वह एक ऐसा बलिदान है, जो खुले दान-गृह से श्रेष्ठ है, निरंतर भिक्षादान से श्रेष्ठ है, आवास स्थानों के उपहार से श्रेष्ठ है और पथ-प्रदर्शन स्वीकार करने से श्रेष्ठ है।

  1. ‘और हे गौतम, इन पांचों की तुलना में कोई अन्य बलिदान है, जो अपेक्षाकृत कम कठिन और कष्टकर है, किंतु अधिक फलदायक और लाभप्रद हो?’

‘हां, हे ब्राह्मण, ऐसा है।’

‘और, हे गौतम, वह क्या हो सकता है?’

(इसका उत्तर श्रमण फल सुत्त 40 से 75 में (पुस्तक के पृष्ठ 62 से 74) प्रथम गाथा के एक लंबे उद्धरण में निम्न रूप में दिया गया हैः

  1. बुद्ध के आविर्भाव, उनके उपदेश, श्रोता के मतांतरण, और उनके द्वारा संसार के परित्याग के संबंध में परिचयात्मक अनुच्छेद।

  2. शील (सहज नैतिकता)।

  3. विश्वास के संबंध में परिच्छेद।

  4. ‘इंद्रियों के द्वारा सुरक्षित है’ के संबंध में परिच्छेद।

  5. ‘सावधान तथा आत्मलीन’ के संबंध में परिच्छेद।

  6. ‘संतोष’ के संबंध में परिच्छेद।

  7. एकाकीपन के संबंध में परिच्छेद।

  8. पांच बाधाओं के संबंध में अनुच्छेद।

  9. प्रथम गाथा का वर्णन।