4. सुधारक और उनकी नियति - Page 77

62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

‘हे ब्राह्मण, पूर्वोक्त बलिदानों की तुलना में यह बलिदान कम कठिन, कम कष्टकर है, किंतु अधिक फलदायक और लाभप्रद है।’

दूसरी, तीसरी और चौथी गाथा में क्रमशः यही बात कही गई है (जैसा कि श्रमण फल सुत्त 72.82 में है) और ज्ञान से उत्पन्न होने वाली अंतर्दृष्टि (तदैव 83.84) और आगे (85.96 सम्मिलित, किसी भी प्रकार सीधा वर्णन न करते हुए) आसवों, घातक मादक द्रव्यों से विनाश का ज्ञान (तदैव 97.98)

‘और, हे ब्राह्मण, इससे अधिक श्रेष्ठ और मधुर बलिदानोत्सव मनुष्य नहीं मना सकता।’

  1. और जब वह इस प्रकार बोल चुके, तो कूटदंत ब्राह्मण ने महाभाग से कहाः ‘परम श्रेष्ठ, हे गौतम, आपके मुख से निकले शब्द अत्युत्तम हैं, जैसे कोई मनुष्य उसे स्थापित करे जो कुछ फेंक दिया गया हो, अथवा उसे प्रकट करे जो कुछ छिपाया गया हो, अथवा भटके हुए को कोई उचित मार्ग बताया जाए, अथवा अंधेरे में कोई प्रकाश दे जाए, जिससे आंखों वाले बाह्य स्वरूपों को देख सकें, ठीक वैसे ही जैसे श्रद्धेय गौतम ने मुझे सत्य का ज्ञान कराया है। मैं सिद्धांत तथा आदेश के अनुशीलन के लिए श्रद्धेय गौतम को अपने मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार करता हूं। श्रद्धेय, मुझे एक ऐसे शिष्य के रूप में स्वीकार करें, जिसने आज के दिवस से जीवन-पर्यंत आपको अपना मार्गदर्शक चुन लिया है। और, है गौतम, मैं स्वयं सात सौ सांडों, सात सौ बछियों और सात सौ बछड़ों, सात सौ बकरियों और सात सौ भेढ़ों को मुक्त कराऊंगा। मैं उन्हें जीवन दान देता हूं। वे हरी घास खाएं, ताजा पानी पिएं और उनके चारों ओर ठंडी हवा बहे।’

  2. तब महाभाग ने ब्राह्मण कूटदंत से समुचित क्रमानुसार बातचीत की, अर्थात उन्होंने उसे उदारता, सम्यक आचरण, स्वर्ग, जोखिम, मिथ्या अहंकार, इंद्रिय आसक्तियों की अपवित्रता और परिवर्जन के लाभों के बारे में बताया। और जब महाभाग को यह ज्ञात हो गया कि कूटदंत ब्राह्मण तैयार हो गया है, मृदुल, पूर्वाग्रह रहित, उन्नत और हृदय से निष्ठावान बन गया है, तो उन्होंने उस सिद्धांत की घोषणा की, जिस पर केवल बुद्धों को ही विजय प्राप्त है, अर्थात दुःख, उसके मूल और उसकी समाप्ति तथा सन्मार्ग का सिद्धांत। और जिस प्रकार सभी प्रकार के धब्बों के धुल जाने पर कोई स्वच्छ वस्त्र शीघ्र ही रंग ग्रहण कर लेगा, ठीक वैसे ही कूटदंत ब्राह्मण को वहीं बैठे-बैठे ही सत्य के दर्शन के लिए शुद्ध तथा निष्कलंक दृष्टि प्राप्त हो गई। उसे यह ज्ञान हो गया कि जिस किसी का प्रारंभ होता है, उस प्रारंभ में उसके विलोपन की अनिवार्यता भी निहित है।

  3. और तब एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसने सत्य के दर्शन कर लिए हों, उस पर विजय प्राप्त कर ली हो, उसे समझ लिया हो और उसका गहन चिंतन कर