सुधारक और उनकी नियति
63
लिया हो, जो संदेह के परे पहुंच गया हो, जिसने विमूढ़ता को भगा दिया हो और पूर्ण विश्वास प्राप्त कर लिया हो, और जो गुरु के उपदेशों के अपने ज्ञान के लिए किसी अन्य पर अवलंबित न हो, ब्राह्मण कूटदंत ने महाभाग को संबोधित करते हुए कहाः ‘श्रद्धेय गौतम, कृपया संघ के सदस्यों सहित कल का भोजन मेरे साथ करने की स्वीकृति प्रदान करें।’ और महाभाग ने मौन रहकर अपनी सहमति प्रदान कर दी। यह देखते हुए कि महाभाग ने स्वीकृति प्रदान कर दी है, कूटदंत ब्राह्मण अपने स्थान से उठे और उनके दाईं ओर से गुजरते हुए, वहां से विदा हो गए। और तड़के ही उन्होंने बलिदान के लिए निर्मित वेदी पर पुष्ट और मृदु, दोनों ही प्रकार का मधुर भोजन तैयार करवाया और महाभाग के लिए समय की घोषणा की, हे गौतम, समय हो गया है, भोजन तैयार है। और महाभाग ने, जो प्रातःकाल ही तैयार हो चुके थे, अपना चीवर पहना और अपना पात्र लेकर बांधवों सहित कूटदंत के बलिदान-स्थल पर पहुंचे और वहां अपने लिए तैयार किए गए आसन पर बैठ गए और कूटदंत ब्राह्मण ने बुद्ध तथा बांधवों को अपने हाथों से पुष्ट और मृदु, दोनों ही प्रकार का मधुर भोजन तब तक परोसा, जब तक वे तृप्त नहीं हो गए, और जब महाभाग ने अपना भोजन कर लिया, अपना पात्र और हाथ धो लिए, कूटदंत ब्राह्मण ने नीचे का स्थान लिया और उनके पार्श्व में बैठ गए। और जब वह इस प्रकार आसीन हो गए, महाभाग ने धार्मिक प्रवचन द्वारा कूटदंत ब्राह्मण को अनुदिष्ट, पे्ररित, उत्साहित तथा हर्षित किया, उसके बाद वह अपने आसन से उठे और वहां से विदा हो गए।
(कूटदंत सुत्त समाप्त हुआ)
V
तीसरे, बुद्ध ने जातिप्रथा की निंदा की। जातिप्रथा उस समय वर्तमान रूप में विद्यमान नहीं थी। अंतर्जातीय भोजन और अंतर्जातीय विवाह पर निषेध नहीं था। तब व्यवहार में लचीलापन था। आज की तरह कठोरता नहीं थी। किंतु असमानता का सिद्धांत जो कि जातिप्रथा का आधार है, उस समय सुस्थापित हो गया था और इसी सिद्धांत के विरुद्ध बुद्ध ने एक निश्चयात्मक और कठोर संघर्ष छेड़ा। अन्य वर्गों पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए ब्राह्मणों के मिथ्याभिमान के वह कितने कट्टर विरोधी थे और उनके विरोध के आधार कितने विश्वासोत्पादक थे, उसका परिचय उनके बहुत से संवादों से प्राप्त होता है। इनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण अम्बट्ठ सुत्त के रूप में जाना जाता है।