सुधारक और उनकी नियति
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डंका बज रहा है, वह वास्तविकता के अनुरूप है या नहीं, श्रमण गौतम वैसे ही हैं, जैसा कि उनके विषय में कहा जाता है, अथवा नहीं?’
- ‘लेकिन, श्रीमन्, मैं कैसे जान पाऊंगा कि वह वैसे ही हैं, या नहीं?’
‘अम्बट्ठ, हमारे रहस्यवादी पद्यों में एक महापुरुष के बत्तीस शारीरिक लक्षण बताए गए हैं। अगर वे लक्षण किसी मनुष्य में हों, तो दो में से एक वह अवश्य बनेगा, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं बनेगा। अगर वह गृहस्थ है, तो वह एकछत्र सम्राट, एक धर्मपरायण राजा बनेगा, चार महासागरों के तटों तक उसका शासन होगा, वह एक विजेता होगा और अपनी प्रजा का संरक्षक तथा सात विधियों का स्वामी होगा और ये सात विधियां हैंः चक्र, हाथी, घोड़ा, रत्न, स्त्री, कोषाध्यक्ष और मंत्री। और उसके एक हजार से अधिक वीर और शक्तिशाली पुत्र होते हैं, जो शत्रु की सेनाओं के छक्के छुड़ा देते हैं। और वह समुद्र-पर्यन्त इस विशाल पृथ्वी पर तलवार के बल के बिना धर्मपरायणता के साथ शासन करता हुआ पूर्णप्रभुता से युक्त निवास करता है। लेकिन अगर वह गृहस्थ का त्याग करके गृहविहीन स्थिति में प्रवेश करता है, तो वह बुद्ध बन जाएगा, जो विश्व की आंखों से परदा हटा देता है। अम्बट्ठ, अब तुमने मुझसे रहस्यमय शब्द प्राप्त किए हैं।’
‘बहुत अच्छा, श्रीमन्’, अम्बट्ठ ने उत्तर में कहा, और अपने स्थान से उठकर पोष्करसाति के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए युवा ब्राह्मणों के दल के साथ वह अश्वचालित रथ पर इच्छानंगलकला के अरण्य की ओर चल पड़ा। और वह रथ वहां तक गया, जहां तक वाहनों के लिए मार्ग उपयुक्त था। उसके बाद वह रथ से उतरकर पैदल ही उपवन में गया।
उस समय बहुत से बांधव खुली हवा में इधर-उधर टहल रहे थे। अम्बट्ठ उनके समीप गया और कहा, ‘इस समय श्रद्धेय गौतम कहां ठहरे हुए हैं? हम यहां उनसे मिलने आए हैं।’
तब बांधवों ने सोचाः यह युवा ब्राह्मण अम्बट्ठ विशिष्ट परिवार का है और विख्यात ब्राह्मण पोष्करसाति का शिष्य है। महाभाग ऐसे व्यक्ति के साथ वार्तालाप करने में कठिनाई महसूस नहीं करेंगे। और उन्होंने अम्बट्ठ से कहा, ‘गौतम वहां ठहरे हुए हैं, जहां द्वार बंद हैं, चुपचाप ऊपर जाओ और धीरे से ड्योढ़ी में प्रवेश करो और खांसकर दस्तक दो। महाभाग तुम्हारे लिए द्वार खोल देंगे।’
तब अम्बट्ठ ने ऐसा ही किया। और महाभाग ने द्वार खोल दिया, अम्बट्ठ भीतर चला गया और अन्य युवा ब्राह्मण भी अंदर चले गए और उन्होंने महाभाग से नम्रता तथा शालीनता से पूर्ण शुभकामनाओं का आदान-प्रदान किया तथा अपना स्थान ग्रहण किया। लेकिन अम्बट्ठ टहलता रहा और उसने अचानक बड़ी बेचैनी से खड़े-खड़े बैठे हुए महाभाग से कुछ विनीत स्वर में कहा।