66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
और महाभाग ने उससे कहाः ‘अम्बट्ठ, क्या वृद्ध गुरुओं और अपने गुरुओं के वयोवृद्ध गुरुजनों से बात करने का तुम्हारा यही व्यवहार है, जैसे कि तुम अब इधर-उधर टहलते हुए अथवा खड़े-खड़े मुझसे बात कर रहे हो, जब कि मैं बैठा हुआ हूं।’
‘अवश्य नहीं, गौतम। अगर ब्राह्मण स्वयं चल रहा हो तो उससे चलते हुए बोलना, अगर ब्राह्मण खड़ा है तो खड़े-खड़े, अगर उसने आसन ग्रहण कर लिया है तो बैठकर, अथवा अगर ब्राह्मण सहारे से लेटा है तो सहारा लेकर उससे बोलना उचित है। लेकिन मुंडित सिर वालों, छद्मवेशी साधुओं, काले भृत्यों और हमारे कुल की सेवा में रत अधम जातियों के साथ मैं उसी प्रकार बोलूंगा जैसा कि अब मैं आपसे बोल रहा हूं।
‘लेकिन, अम्बट्ठ, जब तुम यहां आए हो, तो तुम्हें किसी चीज की जरूरत रही होगी। अच्छा तो यही है कि तुम यहां अपने आने के उद्देश्य पर विचार करो। यह युवा ब्राह्मण अम्बट्ठ अशिष्ट है, यद्यपि वह अपनी संस्कृति पर गर्व करता है। क्या ऐसा व्यवहार प्रशिक्षण के अभाव के सिवाय किसी अन्य कारण से हो सकता है?’
- तब अम्बट्ठ अशिष्ट कहे जाने पर महाभाग से अप्रसन्न और नाराज हो गया और यह विचार करते हुए कि महाभाग उससे कुपित हैं, उसने व्यंग्य और उपहास करते हुए अवज्ञापूर्ण ढंग से महाभाग से कहाः ‘गौतम, आपका यह शाक्य कुल असुसंस्कृत है, आपका शाक्य वंश अशिष्ट, चिड़चिड़ा और उग्र है। भृत्य केवल भृत्य हैं, वे न तो ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा रखते हैं, न उन्हें महत्व देते हैं, न उन्हें उपहार देते हैं, और न उनका सम्मान करते हैं। गौतम, ऐसा व्यवहार न तो उपयुक्त है, न ही भद्रोचित है।’
इस प्रकार युवा ब्राह्मण अम्बट्ठ ने पहली बार शाक्यों पर भृत्य होने का लांछन लगाया।
- लेकिन, अम्बट्ठ, शाक्यों ने तुम्हारे प्रति कौन-सा दुर्व्यवहार किया है?
‘एक बार, गौतम, मुझे पोष्करसाति के किसी कार्य से कपिलवस्तु जाना पड़ा और मैं शाक्यों के सभा भवन में चला गया। उस समय बहुत से वृद्ध और युवा शाक्य मंडप में भव्य आसनों पर बैठे हुए आनंद मना रहे थे और साथ-साथ परिहास कर रहे थे, अपनी अंगुलियों से एक-दूसरे को धकिया रहे थे, और सच पूछो तो मेरे विचार में उनके परिहास का विषय स्वयं में था, और किसी ने बैठने तक को नहीं कहा। और, गौतम, न तो यह उपयुक्त है, और न ही भद्रोचित है, क्योंकि शाक्य भृत्य केवल भृत्य हैं, जो न तो ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा रखते हैं, न उन्हें महत्व देते हैं, न उन्हें उपहार देते हैं, और न उनका सम्मान करते हैं।
इस प्रकार युवा ब्राह्मण अम्बट्ठ ने दूसरी बार शाक्यों पर भृत्य होने का लांछन लगाया।
- ‘इतनी छोटी-सी बात पर बुरा मान गए, अम्बट्ठ। नन्हीं-सी हठी चिडि़या अपने घोंसले में जो चाहे, बोल सकती है। और शाक्य तो कपिलवस्तु में अपने ही घर में थे। इतनी छोटी-सी बात पर बुरा मान जाना तुम्हें शोभा नहीं देता।’