68 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मुझे इस कलुष से मुक्त करो। तभी मैं आपके काम आ सकूंगा।’ अम्बट्ठ, अब
जिस प्रकार लोग असुरों को असुर कहते हैं, उसी प्रकार उस समय लोग काले
(कान्हे) को असुर कहते थे। और उन्होंने कहाः ‘यह पैदा होते ही बोल पड़ा।
यह जो काला (कान्हा) बच्चा पैदा हुआ है, यह एक असुर पैदा हुआ है।’ और
अम्बट्ठ कान्हायनों का मूल यही है। वह कान्हायनों का पूर्वज था। और मातृ पक्ष
की ओर से तुम्हारे पुराने नाम और तुम्हारी वंश-परंपरा का अध्ययन करें, तो यह
पता चलेगा कि किसी समय शाक्य तुम्हारे स्वामी होते थे और तुम उनकी किसी
एक दासी की संतान हो।
और जब वह इस प्रकार बोल चुके तो युवा ब्राह्मणों ने महाभाग से कहाः ‘श्रद्धेय गौतम, अम्बट्ठ पर दासी कुल से उत्पन्न होने का कलंक लगाकर उसे और नीचा न दिखाएं। वह अच्छे वंश में उत्पन्न हुआ है और अच्छे परिवार का है। वह पवित्र देव स्तुतियों से सुपरिचित एक योग्य पाठक और विद्वान पुरुष है और वह इन मामलों में श्रद्धेय गौतम को उत्तर देने में समर्थ है।’
तब महाभाग ने उनसे कहाः ‘बिल्कुल ऐसा ही होगा। अगर तुम अन्यथा समझते हो, तो हमारी इस वार्ता को आगे बढ़ाने का काम तुम्हारा होगा। लेकिन जब तुम इस प्रकार सोचते हो, तो स्वयं अम्बट्ठ को बोलने दिया जाए।’
‘हम ऐसा नहीं सोचते। और हम मौन ही रहेंगे। अम्बट्ठ इन मामलों में श्रद्धेय गौतम को उत्तर देने में समर्थ है।’
तब महाभाग ने अम्बट्ठ ब्राह्मण से कहाः ‘तब आगे यह प्रश्न उठता है, अम्बट्ठ, जो बहुत ही सुसंगत है, और अनिच्छापूर्वक ही सही, तुम्हें इस प्रश्न का उत्तर अवश्य देना होगा। अगर तुम स्पष्ट उत्तर नहीं दोगे, अथवा दूसरे प्रसंग पर चले जाओगे, अथवा मौन रहोगे, अथवा विचलित हो जाओगे, तो तुम्हारा सिर इसी स्थल पर खंड-खंड हो जाएगा। जब वयोवृद्ध और अनुभवी ब्राह्मण तुम्हारे गुरुजन अथवा उनके गुरुजन इस बारे में आपस में बात कर रहे थे कि कान्हायनों की मूल उत्पत्ति कहां से हुई और उनका वह पूर्वज कौन था जिसका कि वे अपने-आपको वंशज बताते हैं, तुमने इस बारे में क्या सुना है?’
और जब वह इस प्रकार बोल चुके, तो अम्बट्ठ मौन रहा और महाभाग ने फिर से वही प्रश्न पूछा। और फिर भी अम्बट्ठ मौन रहा। तब महाभाग ने उससे कहाः ‘अम्बट्ठ, बेहतर यही होगा कि तुम अब इसका उत्तर दे दो। यह तुम्हारे चुप रहने का समय नहीं है। क्योंकि कोई भी यदि तथागत (जिसने सत्य पर विजय प्राप्त कर ली हो) द्वारा तीसरी बार पूछे जाने पर भी एक सुसंगत प्रश्न का उत्तर नहीं देता, तो उसका सिर वहीं टुकड़ों में खंडित हो जाता है।’